31. देवगंधार

31. देवगंधार

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सिखवति चलन जसोदा मैया।
अरबराइ कैं पानि गहावति, डगमगाइ धरनी धरै पैया।।
कबहुंक सुन्दर बदन बिलोकति उर आनंद भरि लेति बलैया।
कबहुंक कुल-देवता मनावति, चिर जीवहु मेरी कुंवर कन्हैया।।
कबहुंक बलकों टेरि बुलावति, इहिं आंगर खेलौ दोउ भैया।
सूरदास, स्वामी की लीला अति प्रताप बिलसत नंदरैया।।5।।
शब्दार्थ :- अरबराइ कैं = जल्दी में घबराकर। पानि गहावति = हाथ पकड़ाती है।
पैयां = छोटे-छोटे पैर। बल =बलराम। टेरि =पुकारकर।
टिप्पणी :- दो डग आगे रखकर नंदनंदन जब अरबराकर गिरने लगते हैं, तब यशोदा अपना हाथ
पकड़ाकर फिर चलाने लगती हैं, बार-बार सुन्दर मुख देखती और बलैया लेती हैं। जब अपने
-आप थोड़ा-सा चलने लगते हैं, तब बलराम को पुकार कर बुलाती और कहती हैं, ~देखो,
तुम्हारा भैया कैसा खेलता है, आओ, दोनों भाई यहीं आंगन में खेलो।”

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