29. धनाश्री

29. धनाश्री

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किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत।
मनिमय कनक नंद के आंगन, बिंब पकरिबे धावत।।
कबहुं निरखी हरि आपु छांह कों, कर सों पकरन चाहत।
किलकि हंसत राजति द्वै दंतियां पुनि-पुनि तिहिं अवगाहत।।
कनकभूमि पर कर पग छाया, यह उपमा इक राजत।
करि-करि प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा कमल बैठकी साजत।।
बालदशा सुख निरखी जसोदा पुनि-पुनि नंद बुलावति।
अंचरा तर लै ढांकि सूर प्रभु, जननी दूध पियावति।।3।।
शब्दार्थ :-किलकत = किलकारी देते हैं। घुटुरुवनि =घुटनों के बल। बिंब =परछाहीं
कनक =सुवर्ण। प्रतिमन = प्रतिमाओं को। अंचरा =आंचल।
टिप्पणी :- ‘कनक-भूमि…साजत,’ सुवर्ण की धरती पर कृष्ण के हाथ-पैरों की परछाहीं
पड़ रही है , मानो पृथ्वी कृष्ण के प्रत्येक चरण की मूर्ति बनाकर अपनी कमल की बैठक
सजा रही है। नागरी प्रचारिणी सभा काशी से प्रकाशित ‘सूर-सुषमा’ में, पंडित
नण्ददुलारे वाजपेयी ने ‘कमल बैठकी’ के बड़े सुन्दर अर्थ किए हैं :-
‘इसके दो अर्थ हो सकते हैं। एक तो, कमल की बैठक, दूसरा, कमल से बैठक सजा रही है।
पृथ्वी अपनी कमल की बैठक सजा रही है, अर्थात अपना ‘सरोज-सदन’ सजा रही है।
दूसरे अर्थ में, पृथ्वी कृष्ण के चरणों की प्रतिमा बनाती और हाथों के कमलों से अपनी
बैठक सजाती है। पहले अर्थ में अधिक चमत्कार है, किन्तु दूसरा अर्थ अधिक स्पष्ट है”

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