28. धनाश्री

28. धनाश्री

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सुत-मुख देखि जसोदा फूली।
हरषित देखि दूध की दंतुली, प्रेम-मगन तन की सुधि भूली।।
बाहिर तें तब नंद बुलाए, देखौं धौ सुन्दर सुखदाई।
तनक-तनक-सी दूध-दंतुलियां, देखौ, नैन सफल करौं आई।।
आनंद सहित महर तब आये, मुख चितवत दोउ नैन अघाई।
सूर स्याम किलकत द्विज देखे, मानों कमल पर बिज्जु जमाई।।2।।
शब्दार्थ :-फूली = प्रसन्न हुई। दंतुली = छोटे-छोटे दांत। तनक-तनक-सी =जरा-सी।
महर =गोप, नंद बाबा से तात्पर्य है। द्विज = दांत। बिज्जु =बिजली।
टिप्पणी :- ‘मनो कमल पर बिज्जु जमाई,” मानो मुख-कमल पर दंत-रूपी दामिनि जड़ी हुई
है। दूध की दंतुलियां निकल आने पर माता को कितनी प्रसन्नता होती है।

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