27. धनाश्री

27. धनाश्री

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जसोदा हरि पालने झुलावै।
हलरावै, दुलराइ मल्हावै, जोइ सोइ कछु गावै।।
मेरे लाल को आउ निंदरिया, काहै न आनि सुवावै।
तू काहे नहिं बेगहिं आवै, तो कों कान्ह बुलावै।।
कबहुं पलक हरि मूंदि लेत हैं, कबहुं अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन ह्वै के रहि, करि करि सैन बतावै।।
इहिं अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै।
जो सुख सूर, अमर मुनि दुरलभ, सो नंद-भामिनि पावै।।1।।
शब्दार्थ :-पालना =झूला। हलरावै =हाथ में लेकर हिलाती है। मल्हावै =पुचकारती
है। जोइ सोइ कछु गावै = मन में जो आता है, वही योंही कुछ गुनगुनाती है।
निंदरिया = नींद। सैन =आंख का इशारा। मधुरै = धीरे-धीरे सुर में।
नंद-भामिनि =नंद की पत्नी, यशोदा।
टिप्पणी :- ‘मेरे लाल कों…बुलावे,’ में बच्चे को सुलाने के समय का माता का यह
गीतोद्गार बड़ा स्वाभाविक है। फिर ‘सोवत जानि…बतावै,’ इस पंक्ति में माता की
प्रकृति का कितना अच्छा मनोवैज्ञानिक चित्षण किया गया है। उधर ‘कबहुं पलक…फरकावै
और ‘इहिं अन्तर अकुलाइ उठें आदि में हैं शिशु की स्वाभाविक क्रियाएं।
बाललीला का यह रस देवताओं और मुनियों को भी दुर्लभ है।

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