23. सारंग

23. सारंग

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मो सम कौन कुटिल खल कामी।
जेहिं तनु दियौ ताहिं बिसरायौ, ऐसौ नोनहरामी।।
भरि भरि उदर विषय कों धावौं, जैसे सूकर ग्रामी।
हरिजन छांड़ि हरी-विमुखन की निसदिन करत गुलामी।।
पापी कौन बड़ो है मोतें, सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, सुनिए श्रीपति स्वामी।।23।।
शब्दार्थ :-कुटिल = कपटी। विषय = सांसारिक वासनाएं।
ग्रामी सूकर =गांव का सूअर। श्रीपति = श्रीकृष्ण से आशय है।

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