21. केदारा

21. केदारा

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है हरि नाम कौ आधार।
और इहिं कलिकाल नाहिंन रह्यौ बिधि-ब्यौहार।।
नारदादि सुकादि संकर कियौ यहै विचार।
सकल स्रुति दधि मथत पायौ इतौई घृत-सार।।
दसहुं दिसि गुन कर्म रोक्यौ मीन कों ज्यों जार।
सूर, हरि कौ भजन करतहिं गयौ मिटि भव-भार।।21।।
शब्दार्थ :- आधार = भरोसा। बिधि =वेदोक्त कर्म-कांड से आशय है। ब्यौहार =क्रिया,
साधन। सुक =शुकदेव। इतौई =इतना ही। गुन =गुण-सत्व, रज और तमोगुण। जार =जाल।
भवभार =जन्म मरण के चक्र से अभिप्राय है।
टिप्पणी :- ‘हरि-भजन’ ही मुक्ति का सर्वोत्कृष्ट और तत्काल फलदायक साधन है।
इसलिए ‘सब तज, हरि भज’ ही मुख्य है।

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