20. नट

20. नट

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प्रभु, मेरे औगुन चित न धरौ।
समदरसी प्रभु नाम तिहारो, अपने पनहिं करौ।।
इक लोहा पूजा में राखत, इक घर बधिक परौ।
यह दुबिधा पारस नहिं जानत, कंचन करत खरौ।।
इक नदिया इक नार कहावत, मैलो नीर भरौ।
जब मिलिकैं दोउ एक बरन भये, सुरसरि नाम परौ।।
एक जीव इक ब्रह्म कहावत, सूरस्याम, झगरौ।
अब की बेर मोहिं पार उतारौ, नहिं पन जात टरौ।।20।।
शब्दार्थ :- औगुन = अवगुण, दोष। चित्त न धरौ = मन में न लाओ।
पन =प्रण, प्रतिज्ञा। दुबिधा =भेद-भाव। पारस =एक पत्थर जिसके स्पर्श से,
कहते हैं, लोहा सोना हो जाता है। खरौ = चोखा। असली। नार=नाला।
सुरसरि गंगा।
टिप्पणी :- भगवान् समदर्शी हैं। ब्राह्मण और चांडाल को वह एक दृष्टि से देखते
हैं। जीव अपनी स्वयं की शक्ति से कुछ नहीं कर सकता, पुरुषार्थ तो परमात्मा का
ही है। यदि वह जीव के अपराधों पर ध्यान देगा, तब तो न्याय हो चुका ! तब उसकी
समदर्शिता कहां रह जायेगी।

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