17. कल्याण

17. कल्याण

————————
धोखैं ही धोखैं डहकायौ।
समुझी न परी विषय रस गीध्यौ, हरि हीरा घर मांझ गंवायौं।।
क्यौं कुरंग जल देखि अवनि कौ, प्यास न गई, दसौं दिसि धायौ।
जनम-जनम बहु करम किये हैं, तिन में आपुन आपु बंधायौ।।
ज्यौं सुक सैमर -फल आसा लगि निसिबासर हठि चित्त लगायौ।
रीतो पर््यौ जबै फल चाख्यौ, उड़ि गयो तूल, तांबरो आयौ।।
ज्यौं कपि डोरि बांधि बाजीगर कन-कन कों चौहटें नचायौ।
सूरदास, भगवंत भजन बिनु काल ब्याल पै आपु खवायौ।।17।।
शब्दार्थ :- डहकायौ =ठगा गया। गीध्यौ = लालच में पड़ गया। कुरंग = मृग।
जल देखि अवनि कौ = ग्रीष्म में धरती से उठती हुई गर्म हवा को जल समझ लिया, यही
मृगतृष्णा है। सेमर =शाल्मलि वृक्ष। तूल =रूई। तांवरो =मूर्छा।चौंहटे =चौहटा,चौक।
टिप्पणी :- क्षणिक विषय-रसों में आनंद मानकर यह जीव आत्मानन्द से विमुख रह
गया। धोखे में ठगाया गया। ‘हरि-हीरा’ को अंतर में खोकर जीवनभर विषय-रस
में भूला रहा। कालरूपी सर्प खा गया।
‘ज्यों सुक…आयौ.’ तोता सेमर के फल में रात-दिन आशा लगाये बैठा रहा, कि कब पकता
है। अंत में पका जानकर चोंच मारी तो अंदर से केवल रुई निकली। इससे किसकी
भूख बुझी है? विषय-सुखों का परिणाम सारहीन ही है।
अंत में, जब काल-ब्याल के मुख में पड़ गया, तब पछताने से क्या होगा ?

Leave a Reply

Are you human? *