16. लारंग

16. लारंग

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तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान।
छूटि गये कैसे जन जीवै, ज्यौं प्रानी बिनु प्रान।।
जैसे नाद-मगन बन सारंग, बधै बधिक तनु बान।
ज्यौं चितवै ससि ओर चकोरी, देखत हीं सुख मान।।
जैसे कमल होत परिफुल्लत, देखत प्रियतम भान।
दूरदास, प्रभु हरिगुन त्योंही सुनियत नितप्रति कान।।16।।
शब्दार्थ :-जन =दास। नाद =शब्द, राग। सारंग =मृग। भान= भानु,सूर्य।
भाव :- यह अनन्यता का वर्णन है। यह ‘तन्मयता’ से प्राप्त होती है। बिना प्राण
के जैसे ‘प्राणी’ शब्द निरर्थक है, वैसे ही भगवद्भक्ति-रहित जीवन व्यर्थ है।
मृग का राग-प्रेम, चकोर का चन्द्र-प्रेम और कमल का सूर्य प्रेम प्रसिद्ध है। जीव
को इसी प्रकार भगवत्प्रेम में तन्मय हो जाना चाहिए।

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