14. रामकली

14. रामकली

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सरन गये को को न उबार््यो।
जब जब भीर परीं संतति पै, चक्र सुदरसन तहां संभार््यौ।
महाप्रसाद भयौ अंबरीष कों, दुरवासा को क्रोध निवार््यो।।
ग्वालिन हैत धर््यौ गोवर्धन, प्रगट इन्द्र कौ गर्व प्रहार््यौ।।
कृपा करी प्रहलाद भक्त पै, खम्भ फारि हिरनाकुस मार््यौ।
नरहरि रूप धर््यौ करुनाकर, छिनक माहिं उर नखनि बिदार््यौ।
ग्राह-ग्रसित गज कों जल बूड़त, नाम लेत वाकौ दुख टार््यौ।।
सूर स्याम बिनु और करै को, रंगभूमि में कंस पछार््यौ।।14।।
शब्दार्थ :- उबार््यौ =रक्षा की। भीर =संकट। संभार््यौ = हाथ में लिया।
अंबरीष = एक हरि भक्त राजा। दुरवासा = दुर्वासा नामके एक महान क्रोधी ऋषि।
प्रहार््यौ =नष्ट किया। नरहरि = नृसिंह। नखनि =नाखूनों से। बिदार््यौ =चीर फाड़
डाला। रंगभूमि = सभा स्थल।
भाव :- जो भी भगवान की शरण में गया, उसने अभय पद पाया। यद्यपि भगवान् का न कोई मित्र
है, न कोई शत्रु, तो भी सत्य और असत्य की मर्यादा की रक्षा के लिए, अजन्मा होते हुए
भी वह ‘रक्षक’ और ‘भक्षक’ के रूप धारण करते हैं। प्रतिज्ञा भी यही है।

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