11. कान्हरा

11. कान्हरा

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सोइ रसना जो हरिगुन गावै।
नैननि की छवि यहै चतुरता जो मुकुंद मकरंदहिं धावै।।
निर्मल चित तौ सोई सांचो कृष्ण बिना जिहिं और न भावै।
स्रवननि की जु यहै अधिकाई, सुनि हरि कथा सुधारस प्यावै।।
कर तैई जै स्यामहिं सेवैं, चरननि चलि बृन्दावन जावै।
सूरदास, जै यै बलि ताको, जो हरिजू सों प्रीति बढ़ावै।।11।।
शब्दार्थ :- रसना =जीभ, वाणी। छवि =शोभा। मकरंद =पराग। न भावै = अच्छा नहीं लगता
है। अधिकाई = बड़ाई, सार्थकता।
भाव :- ‘हरि-परायण’ होने में ही हरेक इंद्रिय की सार्थकता है, यही इस पद का सार है
‘नैननि की…..धावे’ = नेत्रों को अप्रकट रूप से यहां भ्रमर बनाया गया है। उसी नैन
रूपी मधुकर के सफल जीवन हैं, जो मुकुंदरूपी मकरंद अर्थात कृष्ण-छवि पराग का पान
करने के लिए दौड़ते हैं।

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