10. सारंग

10. सारंग

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आछो गात अकारथ गार््यो।
करी न प्रीति कमललोचन सों, जनम जनम ज्यों हार््यो।।
निसदिन विषय बिलासिन बिलसत फूटि गईं तुअ चार््यो।
अब लाग्यो पछितान पाय दुख दीन दई कौ मार््यो।।
कामी कृपन कुचील कुदरसन, को न कृपा करि तार््यो।
तातें कहत दयालु देव पुनि, काहै सूर बिसार््यो।।10।।
शब्दार्थ :- आछो = अच्छा, सुन्दर। गात =शरीर। अकारथ = व्यर्थ। गार््यो =बरबाद कर
दिया। ज्यो =जीव। तुअ =तेरी। चार््यो = चारों नेत्र, दो बाहर के नेत्र और दो
भीतर के ज्ञान नेत्र। दई =दुर्दैव, दुर्भाग्य। कृपन =लोभी, घृणित। कुचील =मैला,
गंदा। कुदरसन = कुरूप।
भाव :- ‘जनम….हार््यो’ = प्रत्येक जन्म में व्यर्थ ही सुन्दर शरीर नष्ट कर दिया।
नर शरीर पाकर भी हरि का भजन करते न बना। जिस शरीर को ‘मोक्ष का द्वार’ कहा है,
उसे भी विषय-भोगों में नष्ट कर दिया। पर भक्त को प्रभु की कृपा का अब भी भरोसा
है। हरि की कृपा ने बड़े-बड़े कामी, कृपण, मलिन और कुरूपों को भव-सागर से तार
दिया। लेकिन सूर को तो इस नियम में भी अपवाद प्रतीत होता है। न जाने, उस दयालु ने
सूर को क्यों बिसरा दिया !

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