4. सारंग

4. सारंग

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प्रभु, हौं सब पतितन कौ राजा।
परनिंदा मुख पूरि रह्यौ जग, यह निसान नित बाजा।।
तृस्ना देसरु सुभट मनोरथ, इंद्रिय खड्ग हमारे।
मंत्री काम कुमत दैबे कों, क्रोध रहत प्रतिहारे।।
गज अहंकार चढ्यौ दिगविजयी, लोभ छ्त्र धरि सीस।।
फौज असत संगति की मेरी, ऐसो हौं मैं ईस।
मोह मदै बंदी गुन गावत , मागध दोष अपार।।
सूर, पाप कौ गढ दृढ़ कीने, मुहकम लाय किंवार।।4।।
शब्दार्थ :- पूरि रह्यौ =भर रहा है। निसान = नगाड़ा। रु =अरु और।
सुभट =योद्धा। कुमंत = कुमंत्र, बुरी सलाह। प्रतिहार = द्वारपाल। असत =झूठ,दुष्ट
ईस =राजा। मदै = मद ही। मागध =मगध देश के भाट, जो वंश विरुदावली बखानते हैं।
गढ़ =किला। मुहकम = मजबूत। किंवार = किवाड़, फाटक।
भाव :- यहां बड़े पापी की राजा से तुलना की गई है। परनिन्दा ही राजमहल के द्वार पर
नौबत का बजना है। तृष्णा पतितेश का देश है। अनेक मनोरथ योद्धा हैं। इन्द्रियां
तलवार का काम देती हैं।काम कुमंत्री है और क्रोध है द्वारपाल। अहंकार दिग्विजय
कराने में साथी है। सिर पर लोभ का राज छत्र है। दुष्टों की संगति सेना है।
ऐसे नरेश की विरुदावली का गान मोह मदादि कर रहे हैं।
भक्तिवाद में दीनता ही दीनबंधु की शरण में ले जाती है।

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