192. राग रामकली – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग रामकली

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जसोदा ऊखल बाँधे स्याम ।
मन-मोहन बाहिर ही छाँड़े, आपु गई गृह-काम ॥
दह्यौ मथति, मुख तैं कछु बकरति, गारी दे लै नाम ।
घर-घर डोलत माखन चोरत, षट-रस मेरैं धाम ॥
ब्रज के लरिकनि मारि भजत हैं, जाहु तुमहु बलराम ।
सूरि स्याम ऊखल सौं बाधै, निरखहिं ब्रजकी बाम ॥
यशोदाजी ने श्यामसुन्दर को ऊखल में बाँध दिया है । मनमोहन को बाहर (आँगनमें)
ही छोड़कर स्वयं घर के कार्यमें लग गयी हैं । दही मथती जाती हैं और मुखसे नाम
ले -लेकर गाली देती हुई कुछ बकती भी जाती हैं कि ‘यह घर-घर मक्खन चुराता घूमता है
जब कि मेरे घरमें छहों रस (भरे) हैं । ब्रजके लड़कोंको मारकर भाग जाता है । (इसे
नहीं छोड़ूँगी।) बलराम! तुम भी चले जाओ ।’ सूरदासजी कहते हैं कि व्रजकी गोपियाँ
श्यामसुन्दरको ऊखल बँधा देख रही हैं ।

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