191. राग गूजरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग गूजरी

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जसोदा ! कान्हहु तैं दधि प्यारौ ।
डारि देहि कर मथत मथानी, तरसत नंद-दुलारी ॥
दूध-दही-मक्खन लै वारौं, जाहि करति तू गारौ ।
कुम्हिलानौ मुख-चंद देखि छबि, कोह न नैकु निवारौ ॥
ब्रह्म, सनक, सिव ध्यान न पावत, सो ब्रज गैयनि चारौ ।
सूर स्याम पर बलि-बलि जैऐ, जीवन-प्रान हमारौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– सूरदासजी कहते हैं (बलरामजी कह रहे हैं -) ‘यशोदा मैया ! कन्हाईसे
भी तुझे दही प्यारा है ? दही मथनेकी मथानी हाथसे रखदे; देख, नन्दनन्दन (छूटनेको)
तरस रहा है (इसे पहले छोड़ दे )! तू जिसपर गर्व करती है, वह दूध, दही, मक्खन लेकर
मैं इसपर न्यौछावर कर दूँ । इसके मलिन हुए चन्द्रमुख की शोभा देखकर अपने क्रोधको
कुछ कम नहीं करती ?

ब्रह्मा, सनकादि ऋषि तथा (साक्षात) शंकरजी तो जिसे ध्यानमें (भी) नहीं पाते, वही
व्रजमें गायें चराता है । श्यामसुन्दर हमारा जीवन और प्राण है, इसपर तो बार-बार
न्योछावर हो जाना चाहिये ।’

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