187. राग सोरठ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सोरठ

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काहे कौं जसोदा मैया, त्रास्यौ तैं बारौ कन्हैया,
मोहन हमारौ भैया, केतौ दधि पियतौ ।
हौं तौ न भयौ री घर, साँटी दीनी सर-सर,
बाँध्यौ कर जेंवरिनि, कैसें देखि जियतौ ॥
गोपाल सबनि प्यारौ, ताकौं तैं कीन्हौ प्रहारो,

जाको है मोहू कौं गारौ, अजगुत कियतौ ।
और होतौ कोऊ, बिन जननी जानतौ सोऊ,
कैसैं जाइ पावतौ, जौ आँगुरिनि छियतो ॥
ठाढ़ौ बाँध्यौ बलबीर, नैननि गिरत नीर,
हरि जू तैं प्यारौ तोकौं, दूध-दही घियतौ ।
सूर स्याम गिरिधर, धराधर हलधर,
यह छबि सदा थिर, रहौ मेरैं जियतौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– (श्रीबलरामजी कहते जाते हैं -) ‘यशोदा मैया ! बालक कन्हाईको तूने (यह)
त्रास क्यों दी ? मेरे इस मनमोहन भाई ने कितना दही पी लिया ? मैं तो घर नहीं था,
तूने इसे सटासट छड़ीसे मार दिया और रस्सीसे इसके हाथ बाँध दिये – यह देखकर मैं कैसे
जीवित रहता ? यह गोपाल तो सबका प्यारा है, जिसका मुझे भी गर्व है, तूने उसीको पीटा,
यह कितनी अनुचित बात है । माताको छोड़कर कोई दूसरा होता तो उसे भी पता लग जाता,
यदि अँगुलीसे भी वह (श्यामको) छू लेता तो जा कैसे पाता ? मेरे भाईको तूने कसकर
बाँध दिया है, इसके नेत्रों से आँसू झर रहे हैं; श्यामसुन्दरसे भी तुझे दूध, दही और
मक्खन प्यारा है ?’ सूरदासजी कहते हैं कि श्यामसुन्दर गिरिधर हैं और बलरामजी पृथ्वी
को धारण करनेवाले (साक्षात शेष ) हैं, इन दोनों भाइयों की यह छबि मेरे हृदयमें सदा
स्थिर बसी रहे ।

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