182. राग नट – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग नट

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कान्ह सौं आवत क्यौ।़ब रिसात ।
लै-लै लकुट कठिन कर अपनै परसत कोमल गात ॥
दैखत आँसू गिरत नैन तैं यौं सोभित ढरि जात ।
मुक्ता मनौ चुगत खग खंजन, चोंच-पुटी न समात ॥
डरनि लोल डोलत हैं इहि बिधि, निरखि भ्रुवनि सुनि बात ॥
मानौ सूर सकात सरासन, उड़िबे कौ अकुलात ॥

भावार्थ / अर्थ :– सूरदासजी कहते हैं–कन्हैयापर इतना रोष करते (मैया!) तुमसे बनता कैसे
है, जो अपने कठोर हाथमें बार-बार छड़ी लेकर इसके कोमल शरीरका स्पर्श कर रही हो
(इसे मारती हो)! देखती हो इसकी आँखोंसे गिरते हुए आँसू ढुलकते हुए ऐसे शोभित
होते हैं मानो खञ्जन पक्षी मोती चुग रहे हैं, परंतु वे उनके चञ्चु-पुटमें समाते
नहीं (बार-बार गिर पड़ते हैं ) मेरी बात सुनो । भौंहोंकी ओर देखो! भयसे चञ्चल
हुए ये इस प्रकार हिल रहे हैं मानो उड़ जानेको व्याकुल हो रहे हैं, किंतु
(भ्रूरूपी) धनुषको देखखर शंकित हो रहे हैं ।

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