176. राग नटनारायनी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग नटनारायनी

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देखि री देखि हरि बिलखात ।
अजिर लोटत राखि जसुमति, धूरि-धूसर गात ॥
मूँदि मुख छिन सुसुकि रोवत, छिनक मौन रहात ।
कमल मधि अलि उड़त सकुचत, पच्छ दल-आघात ॥
चपल दृग, पल भरे अँसुआ, कछुक ढरि-ढरि जात ।
अलप जल पर सीप द्वै लखि, मीन मनु अकुलात ॥
लकुट कैं डर ताकि तोहि तब पीत पट लपटात ।
सूर-प्रभु पर वारियै ज्यौं, भलेहिं माखन खात ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपी कह रही है -) ‘देखो सखी, देखो तो श्यामसुन्दर क्रन्दन कर रहे हैं।
यशोदाजी इन्हें आँगनमें लोटनेसे बचाओ । (देखो न ) इनका शरीर धूलसे मटमेला हो रहा है
कभी कुछ क्षण मुख ढँककर सिसकारी लेकर रोते हैं, कभी क्षणभर चुप हो जाते हैं । इनकी
ऐसी शोभा हो रही है मानो कमलपरसे भौंरे उड़ना चाहते हों किंतु पंखकी चोट कहीं दलों
को न लगे, इससे संकुचित हो रहे हैं । नेत्र चञ्चल हैं, पलकें आँसूसे भरी हैं, जिनकी
कुछ बूँदे बार-बार ढुलक पड़ती हैं मानो थोड़े जलके ऊपर दो सीप देखकर मछलियाँ
व्याकुल हो रही हैं । जब छड़ीके भयसे तुम्हारी ओर देखते हैं, तब पीताम्बरमें लिपट
जाते (संकुचित हो जाते) हैं ।’ सूरदासजी कहते -‘मेरे इन स्वामीपर तो प्राण न्योछावर
कर देना चाहिये । ये (मक्खन खाते हैं तो भले ही खायँ (इनपर रोष करना तो
अनुचित ही है ) ।’

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