172. राग कल्याण – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग कल्याण

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कहन लागीं अब बढ़ि-बढ़ि बात ।
ढोटा मेरौ तुमहिं बँधायौ तनकहि माखन खात ॥
अब मोहि माखन देतिं मँगाए, मेरैं घर कछु नाहिं !
उरहन कहि-कहि साँझ-सबारैं, तुमहिं बँधायौ याहि ॥
रिसही मैं मोकौं गहि दीन्हौ, अब लागीं पछितान ।
सूरदास अब कहति जसोदा बूझ्यौ सब कौ ज्ञान ॥

भावार्थ / अर्थ :– (यशोदाजीने गोपियोंको डाँटा-) ‘अब तुम सब बढ़-बढ़कर बातें कहने लगी
हो । तुम्हीं सबोंने तो तनिक-सा मक्खन खानेके कारण मेरे पुत्रको बँधवाया है । अब
मुझे (अपने घरोंसे) मक्खन मँगाकर दे रही हो, जैसे मेरे घर कुछ है ही नहीं । बार
बार प्रातः-सायं (हर समय) उलाहना दे-देकर तुम्हीं (सबों) ने तो इसे बँधवाया है ।

क्रोधमें ही इसे पकड़कर तो मुझे दे दिया और अब पश्चाताप करने लगी हो ।’ सूरदासजी
कहते हैं कि यशोदाजीने कहा-‘ अब तुम सबकी समझदारी मैं समझ गयी ।’

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