171. राग बिहागरौ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिहागरौ

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कहौ तौ माखन ल्यावैं घर तैं ।
जा कारन तू छोरति नाहीं, लकुट न डारति कर तैं ॥
सुनहु महरि ! ऐसी न बूझियै, सकुचि गयौ मुख डर तैं ।
ज्यौं जलरुह ससि-रस्मि पाइ कै, फूलत नाहिं न सर तैं ॥
ऊखल लाइ भुजा धरि बाँधी, मोहनि मूरति बर तैं ।
सूर स्याम-लोचन जल बरषत जनु मुकुताहिमकर तैं ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपियाँ कहती हैं-) ‘यशोदाजी! जिसके लिये तुम (मोहनको) खोलती नहीं हो
और हाथसे छड़ी नहीं रख रही हो, वह मक्खन कहो तो हम अपने घरसे ला दें । व्रजरानी !
सुनो, ऐसा तुम्हें नहीं करना चाहिये; (देखो तो) इसका मुख भयसे (उसी प्रकार)
कुम्हिला गया है, जैसे चन्द्रमाकी किरणें पड़नेसे कमल सरोवरमें प्रफुल्लित नहीं
हो पाता । (हाय-हाय) इस श्रेष्ठ मोहिनी मूर्तिके हाथ ऊखलसे लगाकर तुमने बाँध
दिये हैं ।’ सूरदासजी कहते हैं–श्यामसुन्दरके नेत्रोंसे इस प्रकार आँसूकी बूँदें
टपक रही हैं, जैसे चन्द्रमा से मोती बरसते हों ।

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