166. राग सोरठ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सोरठ

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जसुदा! तेरौं मुख हरि जोवै ।
कमलनैन हरि हिचिकिनि रोवै, बंधन छोरि जसोवै ॥
जौ तेरौ सुत खरौ अचगरौ, तउ कोखि कौ जायौ ।
कहा भयौ जौ घर कैं ढोटा, चोरी माखन खायौ ॥
कोरी मटुकी दह्यौ जमायौ, जाख न पूजन पायौ ।
तिहिं घर देव-पितर काहे कौं , जा घर कान्हर आयौ ॥
जाकौ नाम लेत भ्रम छूटे, कर्म-फंद सब काटै ।
सोई इहाँ जेंवरी बाँधे, जननि साँटि लै डाँटै ॥
दुखित जानि दोउ सुत कुबेर के ऊखल आपु बँधायौ ।
सूरदास-प्रभु भक्त हेत ही देह धारि कै आयौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपियाँ कहती हैं-) ‘यशोदाजी ! श्याम तुम्हारा ही मुख देख रहा है ।
कमललोचन मोहन हिचकी ले-लेकर रो रहा है, यशोदाजी! (झटपट इसका) बन्धन खोल दो ।
यदि तुम्हारा पुत्र सचमुच उधमी है, तो भी वह उत्पन्न तो हुआ है तुम्हारे ही पेटसे
न? क्या हो गया जो घरके लड़केने चोरीसे मक्खन का लिया । (देखो तो मैंने ही) कोरी
मटकीमें दही जमाया था, कुल-देवता भी पूजने नहीं पायी थी (कि उसने झूठा कर दिया,
पर मैं क्या क्रोध करती हूँ? अरे) उस घरमें किसके देवता और किसके पितर, जिस घरमें
कन्हैया आ गया, जिसका नाम लेनेसे अज्ञान दूर हो जाता है, कर्म के जालको काट देता
है, उसीको माताने रस्सीसे बाँध दिया है और ऊपरसे छड़ी लेकर डाँट रही है । सूरदासजी
कहते हैं कि मेरे प्रभु तो भक्तोंके लिये ही शरीर धारण करके संसारमें आये हैं;
उन्होंने कुबेरके दोनों पुत्रोंको दुःखी समझकर (उनके उद्धारके लिये) अपनेको ऊखलसे
बँधवा लिया है ।

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