165. राग आसावरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग आसावरी

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जाहु चली अपनैं-अपनैं घर ।
तुमहिं सबनि मिलि ढीठ करायौ, अब आईं छोरन बर ॥
मोहिं अपने बाबाकी सौहैं, कान्हि अब न पत्याउँ ।
भवन जाहु अपनैं-अपनैं सब, लागति हौं मैं पाउँ ॥
मोकौं जनि बरजौ जुवती कोउ, देखौ हरि के ख्याल ।
सूर स्याम सौं कहति जसोदा, बड़े नंद के लाल ॥
(श्रीव्रजरानी कहती हैं -) ‘सब अपने-अपने घर चली जाओ ! तुम्हीं सबने मिलकर
तो इसे ठीढ़ बना दिया है और अब भली बनकर छोड़ने आयी हो । मुझे अपने पिताकी शपथ,
अब मैं कन्हाईका विश्वास नहीं करूँगी ।मैं तुम सबके पैरों पड़ती हूँ, अब अपने-अपने
घर चली जाओ ! कोई युवती मुझे मना मत करो, सब कोई श्यामकी चपलता देखो।’

सूरदासजी कहते हैंकि (व्यंग से) यशोदाजी श्यामसुन्दर से कह रही हैं – ‘तुम सम्मानित
व्रजराजके दुलारे हो न?” (तात्पर्य यह कि पिताके बलपर ऊधम करते थे, अब देखती हुँ
कि पिता तुम्हें कैसे छुड़ाते हैं ।)

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