164. राग सारंग – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सारंग

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बाँधौं आजु, कौन तोहि छोरै ।
बहुत लँगरई कीन्हीं मोसौं, भुज गहि ऊखल सौं जोरै ॥
जननी अति रिस जानि बँधायौ, निरखि बदन, लोचन जल ढोरै ।
यह सुनि ब्रज-जुवती सब धाई, कहतिं कान्ह अब क्यौं नहिं छोरै ॥
ऊखल सौं गहि बाँधि जसोदा, मारन कौं साँटी कर तोरै ।
साँटी देखि ग्वालि पछितानी, बिकल भई जहँ-तहँ मुख मोरे ॥
सुनहु महरि! ऐसी न बूझिए, सुत बाँधति माखन-दधि थोरैं ।
सूर स्याम कौं बहुत सतायौ, चूक परी हम तैं यह भोरैं ॥

भावार्थ / अर्थ :– (माता कहती हैं-) ‘आज तुझे बाँध (ही) दूँगी, देखती हूँ कौन खोलता है ।

साथ बहुत ऊधम तूने किया ।’ यह कहकर हाथ पकड़कर (उसे) रस्सीके द्वारा ऊखलसे बाँध
रही हैं । माताको अत्यन्त क्रोधित देखकर मोहनने अपनेको बँधवा लिया और माताके मुखकी
ओर देखकर आँखोंसे आँसू ढुलकाने लगे । यह सुनकर (कि माताने श्यामको बाँध दिया) व्रज
की सब युवतियाँ दौड़ी आयीं और कहने लगीं – ‘अब कन्हाईको छोड़ क्यों नहीं देती !’
(किंतु) यशोदाजी तो ऊखलसे उन्हें बाँधकर मारनेके लिये हाथसे छड़ी तोड़ रही है ।
छड़ी देखकर गोपियोंको उलाहना देनेका) बड़ा पश्चाताप हुआ ( श्यामके पीटे जानेकी
सम्भावनासे ही व्याकुल होकर उन्होंने जहाँ-तहाँ अपना मुख छिपा लिया )। सूरदासजी
कहते हैं- (वे सब बोलीं-) ‘व्रजरानी! ऐसा तुम्हें नहीं करना चाहिये कि थोड़े-से
मक्खन और दहींके लिये तुमने पुत्रको बाँध दिया। श्यामसुन्दरको तुमने बहुत त्रास
दिया, यह तो भोलेपनके कारण हमलोगोंसे भूल हो गयी (जो उलाहना दिया )’

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