163. राग रामकली – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग रामकली

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जसोदा! एतौ कहा रिसानी ।
कहा भयौ जौ अपने सुत पै, महि ढरि परी मथानी ?
रोषहिं रोष भरे दृग तेरे, फिरत पलक पर पानी ।
मनहुँ सरद के कमल-कोष पर मधुकर मीन सकानी ॥
स्रम-जल किंचित निरखि बदन पर, यह छबि अति मन मानी ।
मनौ चंद नव उमँगि सुधा भुव ऊपर बरषा ठानी ॥
गृह-गृह गोकुल दई दाँवरी, बाँधति भुज नँदरानी ।
आपु बँधावत भक्तनि छोरत, बेद बिदित भई बानी ॥

गुन लघु चरचि करति स्रम जितनौ, निरखि बदन मुसुकानी ।
सिथिल अंग सब देखि सूर-प्रभु-सोभा-सिंधु तिरानी ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपी कहती है-) ‘यशोदाजी! इतना क्रोध तुमने क्यों किया है? हो क्या
गया जो अपने पुत्रसे दही मथनेका मटका भूमिपर लुढ़क गया? (देखो तो) क्रोध-ही-क्रोध
में तुम्हारे नेत्र डबडबा आये हैं, पलकोंपर आँसू उमड़ने लगा है; ऐसा लगता है मानो
शरद्-ऋतुमें खिले कमलके कोषपर भौंरेको देखकर मछली (वहाँ पहुँचकर) संदेहमें पड़ गयी
हो (कि कोषपर जाय या जलमें लौट जाय) तुम्हारे मुखपर पसीनेकी कुछ बूँदे दीखने लगी
हैं, यह छटा तो मनको बहुत ही भाती है, मानो नवीन उमंगसे उमड़कर चन्द्रमाने पृथ्वीपर
अमृतकी वर्षा प्रारम्भ करदी हो ।’ गोकुलके घर-घरने रस्सी दी और श्रीनन्दरानी श्याम
के हाथ बाँध रही है; (इससे) वेदों में भी यह बात प्रसिद्ध हो गयी कि (दयामय) अपने-
आपको बन्धनमें डालकर भी भक्तोंकौ मुक्त करते हैं । उसके कारण उनके मुखको देखकर
गोपी मुस्करा उठी । सूरदासजी कहते हैं कि माताका सारा शरीर शिथिल (थका हुआ) दीखने
लगा है; मानो मेरे प्रभुकी शोभाके समुद्रमें वे (थककर) तैर रही हों ।

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