162. राग सोरठ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सोरठ

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जसुमति रिस करि-करि रजु करषै ।
सुत हित क्रोध देखि माता कैं, मन-हीं-मन हरि हरषै ॥

उफनत छीर जननि करि ब्याकुल, इहिं बिधि भुजा छुड़ायौ ।
भाजन फोरि दही सब डार््यौ, माखन-कीच मचायौ ॥
लै आई जेंवरि अब बाँधौं, गरब जानि न बँधायौ ।
अंगुर द्वै घटि होति सबनि सौं, पुनि-पुनि और मँगायौ ॥
नारद-साप भए जमलार्जुन, तिन कौं अब जु उधारौं ।
सूरदास-प्रभु कहत भक्त हित जनम-जनम तनु धारौं ॥

भावार्थ / अर्थ :– यशोदाजी क्रोध करके बार-बार रस्सी खींच रही हैं । अपने पुत्र की भलाई
(उसके सुधार) के लिये माताका क्रोध देखकर श्याम मन-ही-मन प्रसन्नहो रहे हैं । उफनते
दूधके बहाने माताको व्याकुल करके मोहनने हाथ छुड़ा लिया और बर्तन फोड़कर सारा दही
ढुलका दिया तथामक्खन (भूमिपर गिराकर ) उसकी कीच मचा दी। (इससे और रुष्ट होकर
माता) रस्सी ले आयी कि ‘अब तुम्हें बाँधती हूँ ; किंतु (बाँधनेका) गर्व समझकर बन्धन

में नहीं आये । (माताने) बार-बार और रस्सियाँ मँगायी; किंतु सभी दो अंगुल छोटी ही
पड़ जाती थीं, सूरदासजी कहते हैं, मेरे प्रभु (मन-ही-मन कहने लगे-‘देवर्षि नारदजीके
शापसे (कुबेरके पुत्र) यमलार्जुन(सटे हुए अर्जुनके दो वृक्ष हो गये हैं, इनका अब
उद्धार कर दूँ; क्योंकि मैं तो भक्तोंके लिये ही बार-बार अवतार लेकर शरीर धारण
करता हूँ ।’

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