159. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल

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सुनि-सुनि री तैं महरि जसोदा । तैं सुत बड़ौ लगायौ ।
इहिं ठोटा लै ग्वाल भवन मैं, कछु बिथर््यौ कछु खायौ ॥
काकैं नहीं अनौखौ ढोटा, किहिं न कठिन करि जायौ ।
मैं हूँ अपनैं औरस पूतै बहुत दिननि मैं पायौ ॥

तैं जु गँवारि ! भुज याकी, बदन दह्यौ लपटायौ ।
सूरदास ग्वालिनि अति झूठी, बरबस कान्ह बँधायौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– (गोपी कहती है -) ‘सुनो, सुनो, व्रजरानी यशोदा ! तुमने अपने पुत्रको
बहुत दुलारा (जिससे यह बिगड़ गया ) है । (तुम्हारे) इस बालकने गोपबालकोंको (साथ)
लेकर तथा (मेरे) भवनमें जाकर वहाँ कुछ गोरस ढुलकाया तथा कुछ खाया । किसका बालक
अनोखा (निराला) नहीं होता,किसने बड़े कर्टसे उत्पन्न नहीं किया है मैंने भौ तो अपने
गर्भ से (यह) पुत्र बहुत दिनों पर पाया है (अर्थात् मेरे भी तो बड़ी अवस्थामें
पुत्र हुआ; किंतु इतना अनर्थ तो वह भी नहीं करता )।’ सूरदासजी कहते हैं – व्रजरानी
ने उसे उलटे डाँटा -) ‘तू भी गँवार (झगड़ालू) है इस मेरे लालका हाथ पकड़कर तूने ही
इसके मुखमें दही लिपटा दिया है । ये गोपियाँ अत्यन्त झूठ बोलने वाली हैं । झूठ-मूठ
ही इन्होंने कन्हाईको बँधवा दिया ।’

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