158. राग गौरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग गौरी

[220]

……………
ह्वाँ लगि नैकु चलौ नँदरानी!
मेरे सिर की नई बहनियाँ, लै गोरस मैं सानी ॥
हमै-तुम्है रिस-बैर कहाँ कौ, आनि दिखावत ज्यानी ।
देखौ आइ पूत कौ करतब, दूध मिलावत पानी ॥
या ब्रज कौ बसिबौ हम छाड़्यौ, सो अपने जिय जानी ।
सूरदास ऊसर की बरषा थोरे जल उतरानी ॥

भावार्थ / अर्थ :– (एक गोपी कहती है-)’नन्दरानी! तनिक वहाँतक चलो ! मेरे मस्तक पर की
नयी गगरी लेकर (तुम्हारे लालने) गोरस से लथपथ कर दी । हमारे और तुम्हारे में किस
बातकी खीझ या शत्रुता है जो अपनी हानि (स्वयं) कर दिखायेंगी । तुम आकर अपने पुत्रके
करतब देख लो कि हम (कहाँतक) दूधमें पानी मिलाती हैं (झूठ बोलती हैं ) अपने मनमें यह
समझ लिया कि इस व्रजमें बसना हमें छोड़ना ही पड़ेगा ।’ सूरदासजी कहते हैं कि यह तो
ऊसर पर हुई वर्षा के समान है, जहाँ थोड़ा-सा जल पड़ते ही पानी छलकने लगता है ।
अर्थात् थोड़ी सी सम्पत्ति या श्यामसुन्दरकी थोड़ी-सी बाल-विनोदकी कृपा पाकर ही यह
ओछी गोपी अपनी सीमासे बाहर होकर इतराने लगी है ।

Leave a Reply

Are you human? *