156. राग रामकली – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग रामकली

[217]

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माखन खात पराए घर कौ ।
नित प्रति सहस मथानी मथिऐ, मेघ-सब्द दधि-माट-घमरकौ ॥
कितने अहिर जियत मेरैं घर, दधी मथि लै बेंचत महि मरकौ ।
नव लख धेनु दुहत हैं नित प्रति, बड़ौ नाम है नंद महर कौ ॥
ताके पूत कहावत हौ तुम, चोरी करत उघारत फरकौ ।
सूर स्याम कितनौ तुम खैहौ, दधि-माखन मेरैं जहँ-तहँ ढरकौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– सूरदासजी कहते हैं-(माता समझाती हैं-) ‘तुम दूसरेके घरका मक्खन
खाते हो ! (तुम्हारे घरमें) प्रतिदिन सहस्त्रों मथानियोंसे दही मथा जाता है,
दहीके मटको से जो घरघराहट निकलती है, वह मेघगर्जनाके समान होती है । कितने
ही अहीर मेरे घर जीते (पालन-पोषण पाते) हैं, दही मथकर वे मट्ठेके मटके बेच
लेते हैं । व्रजराज श्रीनन्दजीका बड़ा नाम है, उनके यहाँ प्रतिदिन नौ लाख गायें
दुही जाती है । उनके तुम पुत्र कहलाते हो और चोरी करके छप्पर उजाड़ते (अपने
घरकी कंगाली प्रकट करते) हो । श्यामसुन्दर! तुम कितना खाओगे, दही-मक्खन तो
मेरे घर जहाँ-तहाँ ढुलकता फिरता है ।’

[218]

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मैया मैं नहीं माखन खायौ ।
ख्याल परै ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ ॥
देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँचैं धरि लटकायौ ।
हौं जु कहत नान्हे कर अपनैं मैं कैसैं करि पायौ ॥
मुख दधि पोंछि, बुद्धि इक कीन्हीं, दोना पीठि दुरायौ ।
डारि साँटि, मुसुकाइ जसोदा, स्यामहि कंठ लगायौ ॥
बाल-बिनोद-मोद मन मोह्यौ, भक्ति -प्रताप दिखायौ ।
सूरदास जसुमति कौ यह सुख, सिव बिरंचि नहिं पायौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– (श्यामसुन्दर बोले-) ‘मैया ! मैंने मक्खन नहीं खाया है ।

ये सब सखा मेरी हँसी करानेपर उतारू हैं, इन्होंने उसे मेरे (ही) मुखमें लिपटा
दिया तू ही देख ! बर्तन तो छींके पर रखकर ऊँचाई पर लटकाये हुए थे, मैं
कहता हूँ कि अपने नन्हें हाथोंसे मैंने उन्हें कैसे पा लिया ? यों कहकर मुख
में लगा दही मोहन ने पोंछ डाला तथा एक चतुरता की (मक्खनभरा) दोना पीछे छिपा
दिया । माता यशोदाने (पुत्र की बात सुनकर) छड़ी रख दी और मुसकराकर श्यामसुन्दरको
गले लगा लिया । सूरदासजी कहते हैं कि प्रभुने अपने बाल-विनोदके आनन्दसे माताके मनको
मोहित कर लिया. (इस बालक्रीड़ा तथा माता से डरनेमें) उन्होंने भक्तिका प्रताप
दिखलाया । श्रीयशोदाजी को जो यह (श्यामके बाल-विनोदका) आनन्द मिल रहा है,उसे तो
शंकरजी और ब्रह्माजी (भी) नहीं पा सके ।

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