154. राग गौरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग गौरी

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सुनु री ग्वारि ! कहौं इक बात ।
मेरी सौं तुम याहि मारियौ, जबहीं पावौ घात ॥
अब मैं याहि जकरि बाँधौंगी, बहुतै मोहि खिझायौ ।
साटिनि मारि करौ पहुनाई, चितवत कान्ह डरायौ ॥

अजहूँ मानि, कह्यौ करि मेरौ, घर-घर तू जनि जाहि ।
सूर स्याम कह्यौ, कहूँ न जैहौं, माता मुख तन चाहि ॥

भावार्थ / अर्थ :– (व्रजरानी ने कहा-) ‘गोपी! सुन, तुझसे एक बात कहती हूँ ।
तुम सबको मेरी शपथ है- जब भी अवसर पाओ, तुम इसे (अवश्य) मारना । इसने
मुझे बहुत चिढ़ाया है , अब मैं इसे जकड़कर बाँध रखूँगी । छड़ियों से मारकर
इसका आतिथ्य करूँगी ।’ (यों कहकर) श्रीकृष्णकी ओर देखते ही कृष्णचंद्र डर
गये । माताने (उनसे कहा) ‘अब भी मान जा, मेरा कहना कर, तू घर घर मत जाया
कर!’ सूरदासजी कहते हैं कि माताके मुख की ओर देखकर श्यामसुनदर बोले -‘मैया !
मैं कहीं नहीं जाऊँगा ।’

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