153. राग सारंग – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सारंग

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कन्हैया ! तू नहिं मोहि डरात ।
षटरस धरे छाँड़ि कत पर-घर चोरी करि-करि खात ॥
बकत-बकत तोसौं पचि हारी, नैकुहुँ लाज न आई ।
ब्रज-परगन-सिकदार, महर तू ताकी करत ननहई ॥
पूत सपूत भयौ कुल मेरैं, अब मैं जानी बात ।
सूर स्याम अब लौं तुहि बकस्यौ, तेरी जानी घात ॥

भावार्थ / अर्थ :– सूरदासजी कहते हैं- (माताने डाँटा-)’कन्हैया ! तू मुझसे डरता नहीं है ?
घरम रखे छहों रस छोड़कर तू दूसरे घर चोरी करके क्यों खाता है > मैं तुझसे कहते-कहते
प्रयत्न करके थक गयी; पर तुझे तनिक भी लज्जा नहीं आयी ? श्रीव्रजराज इस व्रज-परगने
के सिक्केदार हैं (यहाँ उनका सिक्का चलता है ), तू उनकी हेठी करता है? मैंने अब यह
बात जान ली कि मेरे कुलमें तू बड़ा योग्य पुत्र जन्मा है । श्याम ! अबतक तो मैंने
तुझे क्षमा कर दिया था, पर अब तेरे दाव समझ गयी हूँ ।’

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