148. राग नट – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग नट

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मेरौ माई ! कौन कौ दधि चोरैं ।
मेरैं बहुत दई कौ दीन्हौ, लोग पियत हैं औरै ॥
कहा भयौ तेरे भवन गए जो, पियौ तनक लै भोरै ।
ता ऊपर काहैं गरजति है, मनु आई चढ़ि घोरै ॥

माखन खाइ, मह्यौ सब डारै, बहुरौ भाजन फोरै ।
सूरदास यह रसिक ग्वालिनी, नेह नवल सँग जोरै ॥

भावार्थ / अर्थ :– (व्रजरानी कहति हैं) ‘सखी ! मेरा लाल किसका दही चुराता? देवका
दिया हुआ मेरे घरही बहुत (गोरस) है, दूसरे लोग ही उसे पीते-खाते हैं ।
हो क्या गया जो यह तुम्हारे घर गया और भोलेपनसे थोड़ा-सा (दूध या दही) लेकर पी
लिया । इतनी-सी बातपर गरजती क्यों हो ? मानो घोड़ेपर चढ़ी आयी हो।’ सूरदासजी कहते
हैं -(वह ग्वालिनी बोली-) ‘मोहन मक्खन खा जाते हैं, सब मट्ठा गिरा देते हैं और फिर
बर्तन भी फोड़ देते हैं, यह गोपी तो प्रेमिका है । (उलाहना देनेके बहाने यह) उन अल
बेलेके साथ स्नेहका नाता जोड़ना चाहती है (यशोदाजीकी फटकार इसे बुरी नहीं लगती !)।’

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