135. राग धनाश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग धनाश्री
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गोपाल दुरे हैं माखन खात ।
देखि सखी ! सोभा जु बनी है स्याम मनोहर गात ॥
उठि,अवलोकि ओट ठाढ़े ह्वै, जिहिं बिधि हैं लखि लेत ।
चकित नैन चहूँ दिसि चितवत, और सखनि कौं देत ॥
सुंदर कर आनन समीप, अति राजत इहिं आकार ।
जलरुह मनौ बैर बिधु सौं तजि, मिलत लएँ उपहार ॥
गिरि-गिरि परत बदन तैं उर पर हैं दधि, सूत के बिंदु ।
मानहुँ सुभग सुधा-कन बरषत प्रियजन आगम इंदु ॥
बाल-बिनोद बिलोकि सूर-प्रभु सिथिल भईं ब्रजनारि ।
फुरै न बचन बरजिवैं कारन, रहीं बिचारि-बिचारि ॥
भावार्थ ;– एक गोपी कहती है-) ‘सखी ! गोपाल छिपे-छिपे मक्खन का रहे हैं ।
उनके मनोहर श्यामशरीरकी देख तो कैसी शोभा बनी है? किस प्रकार वे उठते हैं, आड़में
खड़े होकर इधर उधर ताक लेते हैं । चकित नेत्रों से चारों ओर देखते हैं । दूसरे
सखाओं को (मक्खन) देते हैं, इससे इनका सुन्दर हाथ सखाओंके मुखके पास इस प्रकार
शोभा देता है मानो कमल चन्द्रमासे अपनी शत्रुता छोड़कर उपहार लिये हुए उससे मिल रहा
है । मक्खनके बिन्दु बार बार मुखसे वक्षःस्थल पर गिर पड़ते हैं मानो चन्द्रमा अपने
प्रियजन (श्रीकृष्णके के वक्षःस्थलमें स्थित अपनी बहिन लक्ष्मी) का आगमन समझकर
सुहावनी अमृत की बूँदों की वर्षा कर रहा है । सूरदासजी कहते हैं कि मेरे स्वामीका
बाल-विनोद देखकर व्रजकी सभी नारियाँ (प्रेमवश) शिथिल हो रही हैं, वे सोच-सोचकर
रह जाती हैं, किंतु (मोहनको) रोकनेके लिये मुखसे शब्द निकलते ही नहीं ।’
राग-सारंग

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ग्वालिनि जौ घर देखै आइ ।
माखन खाइ चोराइ स्याम सब, आपुन रहे छपाइ ॥

ठाढ़ी भई मथनियाँ कैं ढिग, रीती परि कमोरी ।
अबहिं गई, आई इनि पाइनि, लै गयौ को करि चोरी ?
भीतर गई, तहाँ हरि पाए, स्याम रहे गहि पाइ ।
सूरदास प्रभु ग्वालिनि आगैं, अपनौं नाम सुनाइ ॥

भावार्थ / अर्थ :– जो घरमें आकर देखा तो (घरकी यह दशा थी कि) सब मक्खन चुराकर , खा
पीकर श्यामसुन्दर स्वयं छिप गये थे । वह अपने मटकेके पास खड़ी हुई तो (देखती क्या
है कि) मटका खाली पड़ा है । (सोचने लगी-) ‘मैं अभी-अभी तो गयी थी और इन्हीं पैरों
(बिना कहीं रुके) लौट आयी हूँ, इतनेमें कौन चोरी कर ले गया ?’ भवनके भीतर गयी तो
वहाँ कृष्णचन्द्र मिले । सूरदासजी कहते हैं कि ग्वालिनी के आगे अपना नाम बताकर मेरे
स्वामी श्यामसुन्दरने उसके पैर पकड़ लिये ।

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