127. राग गौरी – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग गौरी

[177]

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मैया री, मोहि माखन भावै ।
जो मेवा पकवान कहति तू, मोहि नहीं रुचि आवै ॥
ब्रज-जुवती इक पाछैं ठाढ़ी, सुनत स्याम की बात ।
मन-मन कहति कबहुँ अपनैं घर, देखौं माखन खात ॥
बैठैं जाइ मथनियाँ कै ढिग, मैं तब रहौं छपानी ।
सूरदास प्रभु अंतरजामी, ग्वालिनि-मन की जानी ॥

भावार्थ / अर्थ :– (श्यामसुन्दर बोले-) ‘मैया! मुझे तो मक्खन अच्छा लगता है । तू जिन
मेवा और पकवान की बात कहती है, वे तो मुझे रुचिकर नहीं लगते ।’ (उस समय मोहनके)
पीछे खड़ी व्रजकी एक गोपी श्यामकी बातें सुन रही थी । वह मन-ही-मन कहने लगी – ‘कभी
इन्हें अपने घरमें मक्खन खाते देखूँ । ये आकर मटकेके पास बैठ जायँ और मैं उस समय
छिपी रहूँ ।’ सूरदासजी कहते हैं कि मेरे स्वामी अन्तर्यामी हैं, उन्होंने गोपिका के
मन की बात जान ली ।

[178]

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गए स्याम तिहि ग्वालिनि कैं घर ।
देख्यौ द्वार नहीं कोउ, इत-उत चितै चले तब भीतर ॥
हरि आवत गोपी जब जान्यौ, आपुन रही छपाइ ।
सूनैं सदन मथनियाँ कैं ढिग, बैठि रहे अरगाइ ॥
माखन भरी कमोरी देखत, लै-लै लागे खान ।
चितै रहे मनि-खंभ-छाहँ तन, तासौं करत सयान ॥
प्रथम आजु मैं चोरी आयौ, भलौ बन्यौ है संग ।
आपु खात, प्रतिबिंब खवावत, गिरत कहत,का रंग ?
जौ चाहौ सब देउँ कमोरी, अति मीठौ कत डारत ।
तुमहि देत मैं अति सुख पायौ, तुम जिय कहा बिचारत ?
सुनि-सुनि बात स्यामके मुखकी,उमँगि हँसी ब्रजनारी ।
सूरदास प्रभु निरखि ग्वालि-मुख तब भजि चले मुरारी ॥

श्यामसुन्दर उस गोपिका के घर गये । (पहुँचते ही) देखा कि द्वारपर कोई नहीं है, तब
इधर-उधर देखकर भीतर चल दिये । जब गोपीने श्यामको आते देखा तो स्वयं छिप गयी ।
सूने घरमें मटकेके पास मोहन चुप साधकर बैठ गये । मक्खन से भरा मटका देखते ही
निकाल-निकालकर खाने लगे । पासके मणिमय खंभेमें अपने शरीरका प्रतिबिम्ब देखकर
(उसे बालक समझकर उसके साथ चतुराईसे बातें करने लगे ‘मैं आज पहली बारचोरी
करने आया हूँ, तुम्हारा-मेरा साथ तो अच्छा हुआ ।’ स्वयं खाते हैं और प्रतिबिम्बको
खिलाते हैं । जब (मक्खन) गिरता है तो –‘यह तुम्हारा क्या ढंग है? यदि चाहो
तो तुम्हें पूरा मटका दे दूँ । मक्खन अत्यन्त मीठा है, इसे गिरा क्यों रहे हो?
तुम्हें भाग देनेमें तो मेरे मनमें बड़ा सुख हुआ है । तुम अपने चित्तमें क्या विचार
करते हो ? श्यामसुन्दरके मुखकी ये बातें सुन-सुनकर गोपी जोरसे हँस पड़ी ।
सूरदासजी कहते हैं कि गोपिका का मुख देखते ही मेरे स्वामी श्रीमुरारि भाग चले ।

[179]

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फूली फिरति ग्वालि मन मैं री ।
पूछति सखी परस्पर बातैं, पायौ पर््यौ कछू कहुँ तैं री ?
पुलकित रोम-रोम, गदगद, मुख बानी कहत न आवै ।
ऐसौ कहा आहि सो सखि री, हम कौं क्यौं न सुनावै ॥
तन न्यारौ, जिय एक हमारौ, हम तुम एकै रूप ।
सूरदास कहै ग्वालि सखिनि सौं, देख्यौ रूप अनूप ॥

भावार्थ / अर्थ :– वह गोपी अपने मनमें प्रफुल्लित हुई घूम रही है । सखियाँ उससे आपसमें
यह बात पूछती हैं, ‘तूने क्या कहीं कुछ पड़ा माल पा लिया है ? तेरा रोम रोम पुलकित
है, कण्ठ गद्गद हो रहा है, जिसके कारण मुखसे बोला नहीं जाता ऐसा क्या है (जिससे
तू इतनी प्रसन्न है)? अरी सखी; परंतु प्राण तो एक ही है, हम-तुम तो एक ही हैं (फिर
हमसे क्यों छिपाती हो)? सूरदासजी कहते हैं कि तब उस गोपी ने सखियों से कहा-
‘मैने एक अनुपम रूप देखा है ।’

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