122. राग रामकली – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग रामकली

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मो देखत जसुमति तेरैं ढोटा, अबहीं माटी खाई ।
यह सुनि कै रिस करि उठि धाई, बाहँ पकरि लै आई ॥
इक कर सौं भुज गहि गाढ़ैं करि, इक कर लीन्हीं साँटी ।
मारति हौं तोहि अबहिं कन्हैया, बेगि न उगिलै माटी ॥
ब्रज-लरिका सब तेरे आगैं, झूठी कहत बनाइ ।
मेरे कहैं नहीं तू मानति, दिखरावौं मुख बाइ ॥
अखिल ब्रह्मंड-खंड की महिमा, दिखराई मुख माँहि ।
सिंधु-सुमेर-नदी-बन-पर्वत चकित भई मन चाहि ॥

करतैं साँटि गिरत नहिं जानी, भुजा छाँड़ि अकुलानी ।
सूर कहै जसुमति मुख मूँदौ, बलि गई सारँगपानी ॥

भावार्थ / अर्थ :– (किसी सखा ने कहा-) ‘यशोदाजी! तुम्हारे पुत्रने मेरे देखते देखते अभी
मिट्टी खायी है ।’ यह सुनते ही माता क्रोध करके दौड़ पड़ी और बाँह पकड़कर श्यामको
(घर) ले आयीं । एक हाथसे कसकर भुजा पकड़कर दूसरे हाथमें छड़ी ले ली (और
डाँटकर बोलीं-) ‘कन्हैया! मैं अभी तुझे मारती हूँ, झटपट तू मिट्टी उगलता है या
नहीं ?'(श्यामसुन्दर बोले-) ‘मैया ! व्रजके ये सभी बालक तेरे सम्मुख झूठी बात बनाकर
कहते हैं । यदि तू मेरे कहनेसे नहीं मानती तो मुख खोलकर दिखला देता हूँ।’ (यों कह
कर) श्यामने मुखके भीतर ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका विस्तार दिखला दिया । समुद्र,
सुमेरु आदि पर्वत,नदियाँ तथा वन (मुखमें देखकर) माता अत्यधिक आश्चर्यमें पड़ गयी ।
हाथसे छड़ी कब गिर गयी, इसका उसे पता ही न लगा । श्यामका हाथ छोड़कर व्याकुल
हो गयी । सूरदासजी कहते हैं कि यशोदाजीने कहा–‘मेरे शार्ङ्गपाणि ! अपना मुख बंद
कर लो, मैं तुमपर बलिहारी जाती हूँ ।’

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