116. राग धनाश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग धनाश्री

[165]

………..$
महराने तैं पाँड़े आयौ ।
ब्रज घर-घर बूझत नँद-राउर पुत्र भयौ, सुनि कै, उठि धायौ ॥
पहुँच्यौ आइ नंद के द्वारैं, जसुमति देखि अनंद बढ़ायौ ।
पाँइ धोइ भीतर बैठार््यौ, भौजन कौं निज भवन लिपायौ ॥
जो भावै सो भोजन कीजै, बिप्र मनहिं अति हर्ष बढ़ायौ ।
बड़ी बैस बिधि भयौ दाहिनौ, धनि जसुमति ऐसौ सुत जायौ ॥
धेनु दुहाइ, दूध लै आई, पाँड़े रुचि करि खीर चढ़ायौ ।
घृत मिष्ठान्न, खीर मिश्रित करि, परुसि कृष्न हित ध्यान लगायौ ॥
नैन उघारि बिप्र जौ देखै, खात कन्हैया देखन पायौ ।
देखौ आइ जसोदा ! सुत-कृति, सिद्ध पाक इहिं आइ जुठायौ ॥
महरि बिनय करि दुहुकर जो रे, घृत-मधु-पय फिरि बहुत मँगायौ ॥
सूर स्याम कत करत अचगरी, बार-बार बाम्हनहि खिझायौ ॥
भावार्थ ;– श्रीयशोदाजी के मायकेसे एक ब्राह्मण (गोकुल) आये । व्रजके घर-घर वे
नन्दरायजी के महलका पता पूछ रहे थे और यह सुनकर कि उनके पुत्र हुआ है वे दौड़े आये
थे । (शीघ्र ही) वे श्रीनन्दजी के द्वारपर आ पहुँचे । उन्हें देखकर माता यशोदाको
बड़ा आनन्द हुआ । उनके चरण धोकर घरके भीतर उन्हें बैठाया और उनके भोजनके लिये
अपना निजी कमरा लिपवा दिया । फिर बोलीं- ‘आपकी जो इच्छा हो, वह भोजन बना लें ।
यह सुनकर विप्रका मन अत्यन्त हर्षित हुआ । वे बोले-‘बहुत अवस्था बीत जानेपर विधाता
अनुकूल हुए; यशोदाजी! तुम धन्य हो जो ऐसा (सुन्दर) पुत्र तुमने उत्पन्न किया ।’
(यशोदाजी) गाय दुहवाकर दूध ले आयीं, ब्राह्मणने बड़ी प्रसन्नतासे खीर बनायी । घी,
मिश्री मिलाकर खीर परोसकर भगवान् कृष्णको भोग लगानेके लिये ध्यान करने लगे । फिर
जब नेत्र खोलकर ब्राह्मण देवताने देखा तो कन्हाई भोजन करते दिखलायी पड़े । (वे बोले
-) ‘यशोदाजी! आकर अपने पुत्रकी करतूत (तो) देखो इसने बना-बनाया भोजन आकर जूठा
कर दिया । व्रजरानी ने दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना की (कि बालक को क्षमा करें और
दुबारा भोजन बना लें) । फिर बहुत-सा घी, मिश्री, दूध मँगा दिया । सूरदासजी (के
शब्दोंमें यशोदाजी कृष्ण से) कहती हैं – श्यामसुन्दर! यह लड़कपन क्यों करते हो ?
बार -बार तुमने ब्राह्मणको खिझाया (तंग किया) है ।

Leave a Reply

Are you human? *