115. राग कान्हरौ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग कान्हरौ

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आवहु, कान्ह, साँझ की बेरिया ।

गाइनि माँझ भए हौ ठाढ़े, कहति जननि, यह बड़ी कुबेरिया ॥
लरिकाई कहुँ नैकु न छाँड़त, सोइ रहौ सुथरी सेजरिया ।
आए हरि यह बात सुनतहीं, धाए लए जसुमति महतरिया ॥
लै पौढ़ी आँगनहीं सुत कौं, छिटकि रही आछी उजियरिया ॥
सूर स्याम कछु कहत-कहत ही बस करि लीन्हें आइ निंदरिया ॥

भावार्थ / अर्थ :– माता कहती हैं, ‘कन्हाई ! सायंकाल हो गया, अब आ जाओ । यह बहुत
कुसमयमें तुम गायों के बीचमें खड़े हो । (इस समय गायें बछड़ोंको पिलानेके लिये उछल
कूद करती हैं, कहीं चोट न लग जाय) तुम तनिक भी लड़कपन नहीं छोड़ते, अब तो स्वच्छ
पलंगपर सो रहो ।’ यह बात सुनते ही श्यामसुन्दर आ गये । माता यशोदाजीने दौड़कर
उन्हें गोदमें उठा लिया । अच्छी चाँदनी फैल रही थी, अपने पुत्रको लेकर (माता) आँगन
में ही (पलंगपर) लेट गयीं ! सूरदासजी कहते हैं कि श्यामसुन्दर कुछ बातें करते ही थे
कि निद्राने आकर उन्हें वशमें कर लिया । (बातें करते-करते वे सो गये ।)

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आँगन मैं हरि सोइ गए री ।
दोउ जननी मिलि कै हरुऐं करि सेज सहित तब भवन लए री ॥
नैकु नहीं घर मैं बैठत हैं, खेलहि के अब रंग रए री ।
इहिं बिधि स्याम कबहुँ नहिं सोए बहुत नींद के बसहिं भए री ॥
कहति रोहिनी सोवन देहु न, खेलत दौरत हारि गए री ।
सूरदास प्रभु कौ मुख निरखत हरखत जिय नित नेह नए री ॥

भावार्थ / अर्थ :– ‘सखी ! श्याम आँगनमें ही सो गये । दोनों माताओं (श्रीरोहिणीजी और यशोदाजी) ने मिलकर
धीरेसे (सँभालकर) पलंगसहित उठाकर उन्हें घरके भीतर कर लिया।’ (माता कहने लगीं -)
‘अब मोहन तनिक भी घरमें नहीं बैठते; खेलनेके ही रंगमें रँगे रहते (खेलनेकी ही
धुनमें रहते) हैं । श्यामसुन्दर इस प्रकार कभी नहीं सोये । (आज तो) सखी! निद्राके
बहुत अधिक वशमें हो गये (बड़ी गाढ़ी नींदमें सो गये ) (यह सुनके) माता रोहिणी कहने
लगीं -‘खेलनेमें दौड़ते-दौड़ते थक गये हैं, अब इन्हें सोने दो न ।’ सूरदासजी कहते
हैं कि मेरे स्वामीके मुखका दर्शन करने से प्राण हर्षित होते हैं और नित्य नवीन अनु
राग होता रहता है ।

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