110. राग नटनारायन – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग नटनारायन

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हरि कौं टेरति है नँदरानी ।
बहुत अबार भई कहँ खेलत, रहे मेरे सारँग-पानी ?
सुनतहिं टेर, दौरि तहँ तहँ आए,कब के निकसे लाल ।
जेंवत नहीं नंद तुम्हरे बिनु, बेगि चलौ, गोपाल ॥
स्यामहि ल्याई महरि जसोदा, तुरतहिं पाइँ पखारे ।
सूरदास प्रभु संग नंद कैं बैठे हैं दोउ बारे ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्रीनन्दरानी हरिको पुकार रही हैं –‘मेरे शार्ङ्गपाणि ! बहुत देर हो
गयी, तुम अबतक कहाँ खेलते थे ? लाल ! तुम कबसे घरसे निकले हो, तुम्हारे बिना
बाबा नन्द भोजन नहीं कर रहे हैं । गोपाल ! अब झटपट चलो ।’ माताकी पुकार सुनकर
श्याम दौड़कर वहाँ आ गये । व्रजरानी यशोदाजीने मोहनको घर ले आकर तुरंत ही उनके
चरण धोये । सूरदासके स्वामी व्रजराजके दोनों बालक व्रजराज श्रीनन्दजी के साथ (भोजन
करने) बैठे हैं ।

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