109. राग सारंग – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सारंग

[154]

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न्हात नंद सुधि करी स्यामकी, ल्यावहु बोलि कान्ह-बलराम ।
खेलत बड़ी बार कहुँ लाई, ब्रज भीतर काहू कैं धाम ॥
मेरैं संग आइ दोउ बैठैं, उन बिनु भोजन कौने काम ।
जसुमति सुनत चली अति आतुर, ब्रज-घर-घर टेरति लै नाम ॥
आजु अबेर भई कहुँ खेलत, बोलि लेहु हरि कौं कोउ बाम ।
ढूँढ़ति फिरि नहिं पावति हरि कौं, अति अकुलानी , तावति घाम ॥
बार-बार पछिताति जसोदा, बासर बीति गए जुग जाम ।
सूर स्याम कौं कहूँ न पावति, देखे बहु बालक के ठाम ॥

भावार्थ / अर्थ :– स्नान करते समय श्रीनन्दजी ने श्यामसुन्दरका स्मरण किया और कहा कि
‘श्याम और बलरामको बुला लाओ । व्रजके भीतर किसीके घरपर कहीं खेलते हुए दोनों
ने बड़ी देर लगा दी । दोनों मेरे साथ आकर बैठैं, उनके बिना भला, भोजन किस कामका ।’
यह सुनते ही श्रीयशोदाजी आतुरतापूर्वक चल पड़ीं । वे व्रजमें घर-घर (पुत्रोंका) नाम
ले-लेकर उन्हें पुकार रही हैं । (गोपियोंसे बोलीं-) ‘आज कहीं खेलते हुए श्यामसुन्दर
को बहुत देर हो गयी, कोई सखी उन्हें बुला तो लाओ ।’ ढूँढ़ते हुए घूमती रहीं, किंतु
मोहनको पा नहीं रही हैं । बहुत व्याकुल हो गयी हैं और धूपसे संतप्त हो उठी हैं,
श्रीयशोदाजी बार बार पश्चाताप कर रही हैं कि ‘दिनके दो पहर बीत गये (मेरे पुत्र अब
भी भूखे हैं) ।’ सूरदासजी कहते हैं कि उन्होंने बालकोंके (खेलनेके) बहुत-से स्थान
देख लिये, किंतु कहीं श्यामसुन्दर को पा नहीं रही हैं ।

[155]

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कोउ माई बोलि लेहु गोपालहि ।
मैं अपने कौ पंथ निहारति, खेलत बेर भई नँदलालहि ॥
टेरत बड़ी बार भई मोकौ, नहिं पावति घनस्याम तमालहि ।
सिध जेंवन सिरात नँद बैठे, ल्यावहु बोलि कान्ह ततकालहि ॥

भोजन करै नमद सँग मिलि कै, भूख लगी ह्वै है मेरे बालहि ।
सूर स्याम-मग जोवति जननी, आइ गए सुनि बचन रसालहि ॥

भावार्थ / अर्थ :– (मैया यशोदा कहती हैं-) ‘कोई सखी गोपालको बुला तो लो ! मैं अपने लालका
मार्ग जोहती हूँ, उस नन्दनन्दनको खेलते हुए देर हो गयी । मुझे पुकारते बहुत देर हो
गयी; किंतु तमालके समान श्याम उस घनश्यामको पा नहीं रही हूँ, बना हुआ भोजन ठंढ़ा
हुआ जाता है । व्रजराज बैठे (प्रतीक्षा कर) रहे हैं, इसलिये कन्हाईको तुरंत बुला
लाओ । मेरे बालकको भूख लगी होगी, वह बाबा नन्दजीके साथ बैठकर भोजन कर ले ।’
सूरदासजी कहते हैं कि माता इस प्रकार मार्ग देख ही रही थीं कि उनकी रसमयी (प्रेम
भरी बात सुनकर श्यामसुन्दर स्वयं आ गये ।

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