108. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल

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भोर भयौ मेरे लाड़िले, जागौ कुँवर कन्हाई ।
सखा द्वार ठाढ़े सबै, खेलौ जदुराई ॥
मोकौं मुख दिखराइ कै, त्रय-ताप नसावहु ।
तुव मुख-चंद चकोर -दृग मधु-पान करावहु ॥
तब हरि मुख-पट दूरि कै भक्तनि सुखकारी ।
हँसत उठे प्रभु सेज तैं, सूरज बलिहारी ॥

भावार्थ / अर्थ :– ‘मेरे दुलारे लाल! सबेरा हो गया, कुँवरकन्हाई जागो । हे यदुनाथ !
तुम्हारे सब सखा द्वार पर खड़े हैं, (उनके साथ) खेलो।

मुझे अपना मुख दिखलाकर तीनों ताप दूर करो । मेरे नेत्र तुम्हारे मुखरूपी चन्द्रमाके
चकोर हैं, इन्हें (अपनी) रूपमाधुरीका पान कराओ ।’ तब भक्तोंके हितकारी प्रभु
श्यामसुन्दर अपने मुखपर से वस्त्र हटाकर हँसते हुए पलंग परसे उठे । सूरदास अपने
इन स्वामी पर बलिहारी है ।

[153]
भोर भयौ जागो नँदनंदन ।
संग सखा ठाढ़े जग-बंदन ॥
सुरभी पय हित बच्छ पियावैं ।
पंछी तरु तजि दहुँ दिसि धावैं ॥
अरुन गगन तमचुरनि पुकार््यौ ।
सिथिल धनुष रति-पति गहि डार््यौ ॥
निसि निघटी रबि-रथ रुचि साजी ।
चंद मलिन चकई रति-राजी ॥
कुमुदिन सकुची बारिज फूले ।
गुंजत फिरत अलि-गन झूले ॥
दरसन देहु मुदित नर-नारी ।
सूरज-प्रभु दिन देव मुरारी ॥
नन्दनन्दन ! सबेरा हो गया, अब जागो । हे विश्वके वन्दनीय ! तुम्हारे सब सखा द्वार
पर खड़े हैं । गायें प्रेमसे बछड़ों को दूध पिला रही हैं, पक्षी पेड़ोंको छोड़कर
दसों दिशाओंमें उड़ने लगे हैं । आकाशमें अरुणोदय देखकर मुर्गे बोल रहे हैं । कामदेव
ने हाथमें लिया धनुष डोरी उतारकर रख दिया है । रात्री व्यतीत हो गयी, भली प्रकार
सजा सूर्यका रथ प्रकट हो गया । चन्द्रमा मलिन पड़ गया और चक्रवाकी अपने जोड़ेसे
मिलकर प्रसन्न हो गयी । कुमुदिनियाँ कुम्हिला गयीं । कमल फूल उठे, उनपर मँडराते
भौंरे गुंजार कर रहे हैं । सूरदासजी कहते हैं कि मेरे सदा के आराध्यदेव श्रीमुरारि!
अब दर्शन दो, जिससे (व्रजके) स्त्री -पुरुष आनन्दित हों ।

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