105. राग बिहागरौ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिहागरौ

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बल-मोहन दोउ करत बियारी ।
प्रेम सहित दोउ सुतनि जिंवावति, रोहिनि अरु जसुमति महतारी ॥
दोउ भैया मिलि खात एक सँग, रतन-जटित कंचन की थारी ।
आलस सौं कर कौर उठावत, नैननि नींद झमकि रही भारी ॥
दोउ माता निरखत आलस मुख-छबि पर तन-मन डारतिं बारी ।
बार बार जमुहात सूर-प्रभु, इहि उपमा कबि कहै कहा री ॥

भावार्थ / अर्थ :– बलराम और श्यामसुन्दर दोनों भाई ब्यालू कर रहे हैं । माता रोहिणी
और मैया यशोदा प्रेमपूर्वक दोनों पुत्रको भोजन करा रही हैं । रत्नजटित सोनेके
थालमें दोनों भाई एक साथ बैठकर भोजन कर रहे हैं । दोनों आलस्यपूर्वक हाथोंसे
ग्रास उठाते हैं, नेत्रों में अत्यन्त गाढ़ी निद्रा छा गयी है । दोनों माताएँ
पुत्रों के अलसाये मुख की शोभा देख रही हैं और उसपर अपना तन-मन न्योछावर किये
देती हैं । सूरदास के स्वामी बार-बार जम्हाई ले रहे हैं; भला, कोई कवि इस छटाकी
उपमा किसके साथ देगा ।

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