103. राग सारंग – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग सारंग

[145]

……………
नंद बुलावत हैं गोपाल ।
आवहु बेगि बलैया लेउँ हौं, सुंदर नैन बिसाल ॥
परस्यौ थार धर््यौ मग जोवत, बोलति बचन रसाल ।
भात सिरात तात दुख पावत, बेगि चलौ मेरे लाल ॥
हौं वारी नान्हें पाइनि की, दौरि दिखावहु चाल ।
छाँड़ि देहु तुम लाल अटपटि, यह गति मंद मराल ॥
सो राजा जो अगमन पहुँचै, सूर सु भवन उताल ।
जो जैहैं बल देव पहिले हीं, तौ हँसहैं सब ग्वाल ॥

भावार्थ / अर्थ :– माता बड़ी रसमयी (प्रेमभरी) वाणीसे पुकारती है ‘सुन्दर
बड़े बड़े लोचनोवाले गोपाल ! शीघ्र आओ, मैं तुम्हारी बलैया लूँ ।

तुम्हें नन्दबाबा बुला रहे है, थाल परोसा हुआ है । (बाबा भोजनके लिये)
तुम्हारा रास्ता देख रहे हैं; भात ठंडा हुआ जाता है, (इससे बाबा)
खिन्न हो रहे हैं, मेरे लाल ! झटपट चलो । मैं तुम्हारे इन नन्हें चरणों
पर बलिहारी जाती हूँ, दौड़कर अपनी चाल तो दिखलाओ । यह हंसके समान अटपटी
मन्दगति (इस समय छोड़ दो ।’सुरदासजी कहते हैं–(मैयाने कहा,)जो शीघ्रता
पूर्वक पहले घर पहुँच जाय, वही राजा होगा । यदि बलराम पहले पहुँच
जायँगेतो सब गोपबालक तुम्हारी हँसी करेंगे ।’

[146]

……………
जेंवत कान्ह नंद इकठौरे ।
कछुक खात लपटात दोउ कर, बालकेलि अति भोरे ॥
बरा-कौर मेलत मुख भीतर, मिरिच दसन टकटौरे ।
तीछन लगी नैन भरि आए, रोवत बाहर दौरे ॥
फूँकति बदन रोहिनी ठाढ़ी, लिए लगाइ अँकोरे।
सूर स्याम कौं मधुर कौर दै कीन्हें तात निहोरे ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्रीनन्दजी और कन्हाई एक स्थानमें ( एक थालमें) भोजन कर
रहे हैं । बालोचित क्रीड़ा के आवेशमें अत्यन्त भोले बने हुए श्रीकृष्ण
कुछ खाते हैं और कुछ दोनों हाथों में लिपटा लेते हैं । कभी मुखमें बड़ेका
ग्रास डालते हैं । (इस प्रकार भोजन करते हुए) दाँतों से मिर्चका स्पर्श
हो जाने पर वह तीक्ण लगी । नेत्रों में जल भर आया, रोते हुए बाहर
दौड़ चले । माता रोहिणी ने उठाकर उन्हें गोदमें ले लिया और खड़ी-खड़ी
उनके मुख को फूँकने लगीं । सूरदासजी कहते हैं कि बाबाने श्यामसुन्दर को
मीठा ग्रास देकर उनको प्रसन्न किया ।

Leave a Reply

Are you human? *