102. राग रामकली – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग रामकली

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जसुमति कान्हहि यहै सिखावति ।
सुनहु स्याम, अब बड़े भए तुम, कहि स्तन-पान छुड़ावति ॥

ब्रज-लरिका तोहि पीवत देखत, लाज नहिं आवति ।
जैहैं बिगरि दाँत ये आछे, तातैं कहि समुझावति ॥
अजहुँ छाँड़ि कह्यौ करि मेरौ, ऐसी बात न भावति ।
सूर स्याम यह सुनि मुसुक्याने, अंचल मुखहि लुकावत ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्रीयशोदाजी कन्हाईको यही सिखला रही हैं कि ‘कन्हाई, सुनो! अब तुम बड़े
हो गये।’ यों कहकर उनका स्तन पीना छुड़ाती हैं । (वे कहती हैं-)व्रजके बालक तुम्हें
स्तन पीते देखकर हँसते हैं, तुम्हें लज्जा नहीं आती ? तुम्हारे ये अच्छे सुन्दर
दाँत बिगड़ जायँगे, इससे तुम्हें बताकर समझा रही हूँ । अब भी तुम (यह स्वभाव)
छोड़ दो, मेरा कहना मानो; ऐसी बात (हठ) अच्छी नहीं लगती । सूरदासजी कहते
हैं कि यह सुनकर श्यामसुन्दर माता के अंचल में (दूध पीने के लिये) मुख छिपाते हुए
मुसकरा पड़े ।

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