96. राग नट – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग नट

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मोहन, मानि मनायौ मेरौ ।
हौं बलिहारी नंद-नँदन की, नैकु इतै हँसि हेरौ ॥
कारौ कहि-कहि तोहि खिझावत, बरज त खरौ अनेरौ ।
इंद्रनील मनि तैं तन सुंदर, कहा कहै बल चेरौ ॥
न्यारौ जूथ हाँकि लै अपनौ, न्यारी गाइ निबेरौ ।
मेरौ सुत सरदार सबनि कौ, बहुते कान्ह बड़ेरौ ॥

बन में जाइ करो कौतूहल, यह अपनौ है खेरौ ।
सूरदास द्वारैं गावत है, बिमल-बिमल जस तेरौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– (माता कहती हैं) ‘मोहन! मेरा मान मनाया (बहुत दुलारा) लाल है । मैं
इस नन्द-नन्दनकी बलिहारी जाती हूँ, लाल! तनिक हँसकर इधर तो देखो । काला कह-
कहकर दाऊ तुम्हें चिढ़ाता है ? तुम्हें खेलनेसे रोकता? वह तो सचमुच बड़ा ऊधमी है,
तुम्हारा शरीर तो इन्द्र-नीलमणिसे भी सुन्दरहै; भला, तुम्हारा सेवक दाऊ तुम्हें
क्या कहेगा । अपनी गायोंको छाँटकर अलग कर लो,वह अपनी गायों के झुण्ड अलग हाँक ले?
मेरा पुत्र तो सबका सरदार है, मेराकन्हाई बहुत बड़ा है; तुम वनमें जाकर क्रीड़ा
करो, यह तो अपना गाँव है (यहाँ तुम्हें कोई कुछ नहीं कह सकता) । सूरदासजी कहते हैं-
प्रभो! मैं भी द्वारपर खड़ा आपका अत्यन्त निर्मल यश गा रहा हूँ ।

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