89. राग ललित – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग ललित

[126]

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जागिए गोपाल लाल, आनँद-निधि नंद-बाल,
जसुमति कहै बार-बार, भोर भयौ प्यारे ।

नैन कमल-दल बिसाल, प्रीति-बापिका-मराल,
मदन ललित बदन उपर कोटि वारि डारे ॥
उगत अरुन बिगत सर्बरी, ससांक किरन-हीन,
दीपक सु मलीन, छीन-दुति समूह तारे ।
मनौ ज्ञान घन प्रकास, बीते सब भव-बिलास,
आस-त्रास-तिमिर तोष-तरनि-तेज जारे ॥
बोलत खग-निकर मुखर, मधुर होइ प्रतीति सुनौ,
परम प्रान-जीवन-धन मेरे तुम बारे ।
मनौ बेद बंदीजन सूत-बृंद मागध-गन,
बिरद बदत जै जै जै जैति कैटभारे ॥
बिकसत कमलावती, चले प्रपुंज-चंचरीक,
गुंजत कल कोमल धुनि त्यागि कंज न्यारे ।
मानौ बैराग पाइ, सकल सोक-गृह बिहाइ,
प्रेम-मत्त फिरत भृत्य, गुनत गुन तिहारे ॥
सुनत बचन प्रिय रसाल, जागे अतिसय दयाल ,
भागे जंजाल-जाल, दुख-कदंब टारे ।
त्यागे-भ्रम-फंद-द्वंद्व निरखि कै मुखारबिंद,
सूरदास अति अनंद, मेटे मद भारे ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्रीयशोदाजी बार-बार कहती हैं–‘गोपाललाल, जागो! आनन्द निधि प्यारे
नन्दनन्दन! सबेरा हो गया । तुम्हारे नेत्र कमल-दल समान विशाल हैं, प्रेमरूपी काचली
के ये हंस हैं, तुम्हारे सुन्दर मुखपर तो करोड़ों कामदेव न्यौछावर कर दिये । देखो,
अरुणौदय हो रहा है, रात्रि बीत गयी, चन्द्रमाकी किरणें क्षीण हो गयीं, दीपक अत्यन्त
(तेजहीन) हो गये, सभी तारोंका तेज घट गया; मानो ज्ञानका दृढ़ प्रकाश होनेसे संसारके
सब भोग-विलास छूट गये, आशा और भयरूपी अन्धकार संतोषरूपी सूर्यकी किरणोंने भस्म
कर दिया हो । पक्षियोंका समूह खुलकर मधुर स्वरमें बोल रहा है, इसे विश्वास करके
सुनो । मेरे लाल! तुम तो मेरे परम प्राण और जीवनधन हो । (देखो पक्षियों का स्वर ऐसा

लगता है) मानो बन्दीजन वेद-पाठ करतेहों, सूतवृन्द और मागधों का समूह, हे कैटभारि !
तुम्हारा सुयश गान करता है और बार-बार जय-जयकार कर रहा है । कमलोंका समूह
खिलने लगा है, भ्रमरोंका झुंड सुन्दर कोमल स्वरसे गुंजार करता कमलोंको छोड़कर अलग
चल पड़ा है । मानो वैराग्य पाकर समस्त शोक और घरको छोड़कर तुम्हारे सेवक तुम्हारा
गुणगान करते प्रेममत्त घूम रहे हौं ।’ (माताके) प्यारे रसमय वचन सुनकर अत्यन्त
दयालु प्रभु जग गये । ( उनके नेत्र खोलते ही जगत के) सब जंजालोंका फंदा दूर हो गया
दुःखोंका समूह नष्ट हो गया । सूरदासने उनके मुखारविन्दका दर्शन करके अज्ञानके सब
फंदे, सब द्वन्द्व त्याग दिये । अब मेरा भारी मद (अहंकार) प्रभुने मिटा दिया, मुझे
अत्यन्त आनन्द हो रहा है ।

[127]
प्रात भयौ, जागौ गोपाल ।
नवल सुंदरी आईं, बोलत तुमहि सबै ब्रजबाल ॥
प्रगट्यौ भानु, मंद भयौ उड़पति, फूले तरुन तमाल ।
दरसन कौं ठाढ़ी ब्रजवनिता, गूँथि कुसुम बनमाल ॥
मुखहि धौइ सुंदर बलिहारी, करहु कलेऊ लाल ।
सूरदास प्रभु आनँद के निधि, अंबुज-नैन बिसाल ॥

भावार्थ / अर्थ :– (मैया कहती हैं -) ‘हे गोपाल! सबेरा हो गया, अब जागो । व्रजकी
सभी नवयुवती सुन्दरी गोपियाँ तुम्हें पुकारती हुई आ गयी हैं । सूर्योदय हो गया,
चन्द्रमाका प्रकाश क्षीण हो गया, तमालके तरुण वृक्ष फूल उठे, व्रजकी गोपियाँ फूलों
की वनमाला गूँथकर तुम्हारे दर्शनके लिये खड़ी हैं । मेरे लाल! अपने सुन्दर मुख को
धोकर कलेऊ करो, मैं तुमपर बलिहारी हूँ ।’ सूरदासजी कहते हैं कि मेरे स्वामी
कमलके समान विशाल लोचनवाले तथा आनन्दकी निधि हैं । (उनकी निद्रामें भी अद्भुत
शोभा और आनन्द है ।)

[128]
जागौ, जागौ हो गोपाल ।
नाहिन इतौ सोइयत सुनि सुत, प्रात परम सुचि काल ॥

फिरि-फिरि जात निरखि मुख छिन-छिन, सब गोपनि बाल ।
बिन बिकसे कल कमल-कोष तैं मनु मधुपनि की माल ॥
जो तुम मोहि न पत्याहु सूर-प्रभु, सुन्दर स्याम तमाल ।
तौ तुमहीं देखौ आपुन तजि निद्रा नैन बिसाल ॥
सूरदासजी कहते हैंकि (मैया मोहनको जगा रही हैं-)’जागो ! जागो गोपाललाल ! प्यारे
पुत्र ! सुनो, सबेरेका समय बड़ा पवित्र होता है, इतने समय तक सोया नहीं जाता ।
क्षण-क्षणमें (बार-बार) तुम्हारे मुखको देखकर सभी ग्वाल-बाल लौट-लौट जाते हैं
(तुम्हारे सब सखा जाग गये हैं )। ऐसा लगता है जैसे बिना खिले सुन्दर कमल-कोष से
भौंरों की पंक्ति लौट लौट जाती हो । तमालके समान श्याम वर्णवाले मेरे सुन्दर लाल!
यदि तुम मेरा विश्वास न करते हो तो नींद छोड़कर अपने बड़े-बड़े नेत्रौंसे स्वयं
तुम्हीं (इस अद्भुत बातको) देख लो ।’

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