85. राग कैदारौ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग कैदारौ

[121]

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जसुमति लै पलिका पौढ़ावति ।
मेरौ आजु अतिहिं बिरुझानौ, यह कहि-कहि मधुरै सुर गावति ॥
पौढ़ि गई हरुऐं करि आपुन, अंग मोर तब हरि जँभुआने ।
कर सौं ठोंकि सुतहि दुलरावति, चटपटाइ बैठे अतुराने ॥
पौढ़ौ लाल, कथा इक कहिहौं, अति मीठी, स्रवननि कौं प्यारी ।
यह सुनि सूर स्याम मन हरषे, पौढ़ि गए हँसि देत हुँकारी ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्रीयशोदाजी श्यामसुन्दरको गोदमें लेकर छोटे पलँगपर सुलाती हैं ।
मेरा लाल आज बहुत अधिक खीझ गया! यह कहकर मधुर स्वरसे गान करती हैं।

वे स्वयं भी धीरे से लेट गयीं; तब श्यामसुन्दर ने शरीर को मोड़कर (अँगड़ाई लेकर)
जम्हाई ली । माता हाथसे थपकी देकर पुत्रको चुचकारने लगी, इतने में मोहन बड़ी
आतुरतासे हड़बड़ाकर उठ बैठे । (तब माता ने कहा-) ‘लाल! लेट जाओ! मैं अत्यन्त
मधुर और कानोंको प्रिय लगनेवाली एक कहानी सुनाऊँगी !’
सूरदासजी कहते हैं कि यह सुनकर श्यामसुन्दर मनमें हर्षित हो उठे, लेट गये और
हँसते हुए हुँकारी देने लगे ।

[122]
सुनि सुत, एक कथा कहौं प्यारी ।
कमल-नैन मन आनँद उपज्यौ, चतुर-सिरोमनि देत हुँकारी ॥
दसरथ नृपति हती रघुबंसी, ताकैं प्रगट भए सुत चारी ।
तिन मैं मुख्य राम जो कहियत, जनक-सुता ताकी बर नारी ॥
तात-बचन लगि राज तज्यौ तिन, अनुज-घरनि सँग गए बनचारी ।
धावत कनक-मृगा के पाछैं, राजिव-लोचन परम उदारी ॥
रावन हरन सिया कौ कीन्हौ, सुनि नँद-नंदन नींद निवारी ।
चाप-चाप करि उठे सूर-प्रभु. लछिमन देहु, जननि भ्रम भारी ॥

भावार्थ / अर्थ :– (माताने कहा-) ‘लाल सुनो! एक प्रिय कथा कहती हूँ ।’ यह सुनकर
कमललोचन श्यामके मनमें प्रसन्नता हुई, वे चतुर-शिरोमणि हुँकारी देने लगे । (माताने
कहा-‘ महाराज दशरथ नामके एक रघुवंशी राजा थे, उनके चार पुत्र हुए । उन (पुत्रों)
में जो सबसे बड़े थे, उनको राम कहा जाता है; उनकी श्रेष्ठ पत्नी थी राजा जनक की
पुत्री सीता । पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये उन्होंने राज्य त्याग दिया और छोटे
भाई तथा स्त्रीके साथ वनवासी होकर चले गये । (वहाँ वनमें एक दिन जब) कमललोचन
परम उदार श्रीराम सोनेके मृगके पीछे (उसका आखेट करने) दौड़ रहे थे, तब रावणने
श्रीजानकी का हरण कर लिया ।’ सूरदासजी कहते हैं कि इतना सुनते ही नन्दनन्दन
ने निद्राको त्याग दी और वे प्रभु बोल उठे–‘लक्ष्मण! धनुष दो, धनुष!’ इससे माताको
बड़ी शंका हुई (कि मेरे पुत्रको यह क्या हो गया )।

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