82. राग रामकली – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग रामकली

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मैया री मैं चंद लहौंगौ ।
कहा करौं जलपुट भीतर कौ, बाहर ब्यौंकि गहौंगौ ॥
यह तौ झलमलात झकझोरत, कैसैं कै जु लहौंगौ ?
वह तौ निपट निकटहीं देखत ,बरज्यौ हौं न रहौंगौ ॥
तुम्हरौ प्रेम प्रगट मैं जान्यौ, बौराऐँ न बहौंगौ ।
सूरस्याम कहै कर गहि ल्याऊँ ससि-तन-दाप दहौंगौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– (श्याम ने कहा-) ‘मैया! मैं चन्द्रमाको पा लूँगा । इस पानीके भीतरके
चन्द्रमाको मैं क्या करूँगा, मैं तो बाहरवालेको उछलकर पकड़ूँगा । यह तो पकड़ने का
प्रयत्न करने पर झलमल-झलमल करता (हिलता) है, भला, इसे मैं कैसे पकड़ सकूँगा ।
वह (आकाशका चन्द्रमा) तो अत्यन्त पास दिखायी पड़ता है, तुम्हारे रोकनेसे अब रुकूँगा
नहीं । तुम्हारे प्रेमको तो मैंने प्रत्यक्ष समझ लिया (कि मुझे यह चन्द्रमा भी नहीं
देती हो) अब तुम्हारे बहकाने से बहकूँगा नहीं ।’ सूरदासजी कहते हैं कि श्यामसुन्दर
(हठपूर्वक) कह रहे हैं -‘मैं चन्द्रमाको अपने हाथों पकड़ लाऊँगा और उसका जो (दूर
रहनेका) बड़ा घमंड है, उसे नष्ट कर दूँगा ।’

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