78. राग कान्हरौ – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग कान्हरौ

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ठाढ़ी अजिर जसोदा अपनैं, हरिहि लिये चंदा दिखरावत ।
रोवत कत बलि जाउँ तुम्हारी, देखौ धौं भरि नैन जुड़ावत ॥
चितै रहे तब आपुन ससि-तन, अपने के लै-लै जु बतावत ।
मीठौ लगत किधौं यह खाटौ, देखत अति सुंदर मन भावत ॥
मन-हीं-मन हरि बुद्धि करत हैं, माता सौं कहि ताहि मँगावत ।
लागी भूख, चंद मैं खैहौं, देहि-देहि रिस करि बिरुझावत ॥
जसुमति कहती कहा मैं कीनौं, रोवत मोहन अति दुख पावत ।
सूर स्याम कौं जसुमति बोधति, गगन चिरैयाँ उड़त दिखावत ॥
भावार्थ ;– श्रीयशोदाजी अपने आँगनमें खड़ी हुई श्यामको गोदमें लेकर च
न्द्रमा दिखला रही हैं – ‘ लाल! तुम रोते क्यों हो, मैं तुम पर बलिहारी
जाती हूँ, देखो तो- भर आँख (भली प्रकार) देखनेसे यह (चंद्रमा) नेत्रों
को शीतल करता है।’ तब श्याम स्वयं चन्द्रमाकी ओर देखने लगे और अपने हाथ उठा
उठाकर दिखलाने (उसी की ओर संकेत करने ) लगे । श्रीहरि मन-ही-मन यह सोचने
लगे कि ‘देखनेमें तो यह बड़ा सुन्दर है और मनको अच्छा बी लगता है; किंतु
पता नहीं (स्वादमें) मीठा लगता है या खट्टा’ मातासे उसे मँगा देनेको
कहने लगे-‘मुझे भूख लगी है, मैं चन्द्रमा को खाऊँगा, तू ला दे ! ला दे
इसे! इस प्रकार इस प्रकार क्रोध करके झगड़ने (मचलने) लगे । यशोदा
जी कहनेलगीं-‘मैंने यह क्या किया, जो इसे चन्द्र दिखाया । अब तो मेरा यह
मोहन रो रहा है और बहुत ही दुःखी हो रहा है ।’ सूरदासजी कहते हैं कि
यशोदाजी श्यामसुन्दरको समझा रही हैं, तथा आकाशमें उड़ती चिड़ियाँ उन्हें
(बहलानेके लिये दिखला रही हैं ।

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किहिं बिधि करि कान्हहिं समुजैहौं ?
मैं ही भूलि चंद दिखरायौ, ताहि कहत मैं खैहौं !
अनहोनी कहुँ भई कन्हैया, देखी-सुनी न बात ।
यह तौ आहि खिलौना सब कौ, खान कहत तिहि तात !
यहै देत लवनी नित मोकौं, छिन छिन साँझ-सवारे ।
बार-बार तुम माखन माँगत, देउँ कहाँ तैं प्यारे ?
देखत रहौ खिलौना चंदा, आरि न करौ कन्हाई ।
सूर स्याम लिए हँसति जसोदा, नंदहि कहति बुझाई ॥
भावार्थ ;– (माता पश्चाताप करती है-) ‘कौन-सा उपाय करके अब मैं
कन्हाईको समझा सकूँगी । भूल मुझसे ही हुई जो मैंने (इसे) चन्द्रमा
दिखलाया; अब यह कहता है कि उसे मैं खाऊँगा ।’ (फिर श्यामसे कहती
हैं-) ‘कन्हाई! जो बात न हो सकती हो, वह कहीं हुई है; ऐसी बात
तो न कभी देखी और न सुनी ही (कि किसीने चन्द्रमाको खाया हो)। यह तो
सबका खिलौना है, लाल! तुम उसे खानेको कहते हो? (यह तो ठीक नहीं है ।
वही प्रत्येक दिन प्रात-सायँ क्षण-क्षणपर मुझे मक्खन देता है और तुम मुझसे
बार-बार मक्खन माँगते हो । (जब इसीको खा डालोगे) तब प्यारे लाल! तुम्हें
मैं मक्खन कहाँसे दूँगी ? कन्हाई हठ मत करो, इस चन्द्रमा रूपी खिलौनेको बस,
देखते रहो (यह देखा ही जाता है, खाया नहीं जाता)।’ सूरदासजी कहते हैं कि
यशोदाजी श्यामसुन्दरको गोदमें लिये हँस रही हैं और श्रीनन्दजीसे समझाकर
(मोहनकी हठ) बता रही हैं ।

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