71. राग धनाश्री – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग धनाश्री

[102]

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दधि-सुत जामे नंद-दुवार ।
निरखि नैन अरुझ्यौ मनमोहन, रटत देहु कर बारंबार ॥
दीरघ मोल कह्यौ ब्यौपारी, रहे ठगे सब कौतुक हार ।
कर ऊपर लै राखि रहे हरि, देत न मुक्ता परम सुढार ॥
गोकुलनाथ बए जसुमति के आँगन भीतर, भवन मँझार ।
साखा-पत्र भए जल मेलत , फुलत-फरत न लागी भार ॥
जानत नहीं मरम सुर-नर-मुनि, ब्रह्मादिक नहिं परत बिचार ।
सूरदास प्रभु की यह लीला, ब्रज-बनिता पहिरे गुहि हार ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्रीनन्दजी के द्वारपर आज मोती उग आये हैं । (व्यापारी मोतियोंका हार
ले आया था)! उसे नेत्रोंके सम्मुख देखते ही श्याम मचल पड़ा ; उसने यह बार बार रट
लगा दी कि इसे मेरे हाथमें दो (किंतु) व्यापारीने बहुत अधिक मूल्य बतलाया, सब लोग
उस आश्चर्यमय हारको देखकर मुग्ध रह गये । श्यामने हारको लेकर हाथपर रख लिया,
वे उन अत्यन्त (आबदार एवं) उत्तम बनावट के मोतियोंको दे नहीं रहे थे । (हार देना तो
दूर रहा,) उन गोकुलके स्वामीने (हार तोड़कर उसके मोतियों को) यशोदाजी के आँगनमें
तथा घरके भीतर बो दिया ।

(श्यामके) जल डालते ही (मोतियोंमेंसे) डालियाँ और पत्ते निकल आये, उन्हें फूलते और
फलते भी कुछ देर नहीं लगी । सूरदासके स्वामीकी इस लीलाका भेद देवता, मनुष्य,
मुनिगण तथा ब्रह्मादि भी नहीं जान सके; उनकी समझमें ही कोई कारण (मोतियोंके उगनेका)
नहीं आया । किंतु व्रजकी गोपियोंने तो उन (मोतियों) को गूँथकर हार पहिना ।

[103]

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कजरी कौ पय पियहु लाल,जासौं तेरी बेनि बढ़ै ।
जैसैं देखि और ब्रज-बालक, त्यौं बल-बैस चढ़ै ॥
यह सुनि कै हरि पीवन लागे, ज्यों-ज्यों लयौ लड़ै ।
अँचवत पय तातौ जब लाग्यौ, रोवत जीभि डढ़ै ॥
पुनि पीवतहीं कच टकटोरत, झूठहिं जननि रढ़ै ।
सूर निरखि मुख हँसति जसोदा, सो सुख उर न कड़ै ॥

भावार्थ / अर्थ :– (माता यशोदा कहती हैं-) ‘लाल! कृष्णा गायका दूध पीलो, जिससे तुम्हारी चोटी
बढ़ जाय । देखो! जैसे व्रजके और बालक हैं, उसी प्रकार तुम्हारा भी बल और आयु
बड़ जायगी ।’ (इस प्रकार समझाकर माताने) जिस-किसी प्रकार लाड़ लड़ा लिया (मना
लिया) । श्याम भी माताकी यह बात सुनकर (दूध) पीने लगे; किंतु पीते ही जब दूध गरम
लगा, तब जिह्वाके जल जानेसे रोने लगे । फिर (दूध) पीते ही बालों को टटोलने
लगे (कि ये बढ़ भी रहे हैं या ) मैया झूठ ही आग्रह कर रही है । सूरदासजी कहते हैं–
यशोदाजी अपने पुत्रके (भोले भावयुक्त) मुख को देखकर हँस रही हैं । यह आनन्द मेरे
हृदयसे बाहर नहीं होता ।

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