70. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल

[100]

………..$
नैकु रहौ, माखन द्यौं तुम कौं ।
ठाढ़ी मथति जननि आतुर, लौनी नंद-सुवन कौं ॥
मैं बलि जाउँ स्याम-घन-सुंदर, भूख लगी तुम्हैं भारी ।
बात कहूँ की बूझति स्यामहि, फेर करत महतारी ॥
कहत बात हरि कछू न समुझत, झूठहिं भरत हुँकारी ।
सूरदास प्रभुके गुन तुरतहिं, बिसरि गई नँद-नारी ॥
श्रीनन्दनन्दनको मक्खन देनेके लिये माता खड़ी होकर बड़ी शीघ्रतासे दही मथ रही
हैं ।(वे कहती हैं-) ‘लाल! तनिक रुको । मैं तुम्हें अभी मक्खन देती हूँ । नवजलधर
-सुन्दर श्याम ! मैं तुमपर बलिहारी जाऊँ, तुम्हें बहुत अधिक भूख लगी है?’ इस प्रकार
इधर-उधरकी बात श्यामसुन्दरसे पूछ-पूछकर माता उन्हें बहला रही हैं । माता क्या
बात कहती है, यह तो मोहन कुछ समझते नहीं, झूठ-मुठ ‘हाँ-हाँ’ करते जा रहे हैं।
(उनकी इस लीलासे) श्रीनन्दरानी सूरदासके स्वामीके गुण (उनकी अपार महिमा) तत्काल
भूल गयीं (और वात्सल्य-स्नेहमें मग्न हो गयीं) ।

[101]
बातनिहीं सुत लाइ लियौ ।
तब लौं मधि दधि जननि जसोदा, माखन करि हरि हाथ दियौ ॥
लै-लै अधर परस करि जेंवत, देखत फूल्यौ मात-हियौ ।
आपुहिं खात प्रसंसत आपुहिं, माखन-रोटी बहुत प्रियौ ॥

जो प्रभु सिव-सनकादिक दुर्लभ, सुत हित जसुमति-नंद कियौ ।
यह सुख निरखत सूरज प्रभु कौ, धन्य-धन्य पल सुफल जियौ ॥

भावार्थ / अर्थ :– यशोदाने अपने पुत्रको बातेंमें लगा लिया और तबतक दही मथकर मक्खन
श्यामके हाथपर रख दिया । मोहन (थोड़ा-थोड़ा माखन) ले-लेकर होठसे छुलाकर
खा रहे हैं, यह देखकर माताका हृदय प्रफुल्लित हो गया है, स्वयं ही खाते हैं और
स्वयं ही प्रशंसा करते हैं, मक्खन-रोटी इन्हें बहुत प्रिय है । जो प्रभु शिव और
सनकादि ऋषियोंको भी दुर्लभ हैं, उन्हें पुत्र बनाकर यशोदाजी और नन्दबाबा उनसे
(वात्सल्य) प्रेम कर रहे हैं । अपने स्वामीका यह आनन्द देखकर सूरदास इस क्षण
को परम धन्य मानता है, जीवनका यही सुफल है (कि श्यामकी बाल-लीलाके दर्शन हों)।

Leave a Reply

Are you human? *