60. राग बिलावल – श्रीकृष्ण बाल-माधुरी

राग बिलावल

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नंद जू के बारे कान्ह, छाँड़ि दै मथनियाँ ।
बार-बार कहति मातु जसुमति नँदरनियाँ ॥
नैकु रहौ माखन देउँ मेरे प्रान-धनियाँ ।
आरि जनि करौ, बलि-बलि जाउँ हौं निधनियाँ ॥
जाकौ ध्यान धरैं सबै, सुर-नर-मुनि जनियाँ ।
ताकौ नँदरानी मुख चूमै लिए कनियाँ ॥
सेष सहस आनन गुन गावत नहिं बनियाँ ।
सूर स्याम देखि सबै भूली गोप-धनियाँ ॥

भावार्थ / अर्थ :– श्रीनन्दरानी माता यशोदाजी बार-बार कहती हैं – ‘व्रजराजके लाड़िले
कन्हैया ~ मथानी छोड़ तो दे । मेरे प्राणधन (जीवन-सर्वस्व) लाल! तनिक रुक जा !
(मैं तुझे अभी) मक्खन देती हूँ ! मैं कंगालिनी तुझपर बार-बार न्योछावर हूँ, हठ मत
कर ।’ जिसका देवता, मनुष्य तथा मुनिगण ध्यान किया करते हैं, श्रीनन्दरानी उसीको
गोदमें लिये उसका मुख चूम रही हैं ।

शेषजी सहस्र मुख से जिसका गुणगान नहीं कर पाते, सूरदासजी कहते हैं कि उसी श्याम
सुन्दरको देककर गोप-नारियाँ अपने -आपको भूल गयी हैं ।

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जसुमति दधि मथन करति, बैठे बर धाम अजिर,
ठाढ़ै हरि हँसत नान्हि दँतियनि छबि छाजै ।
चितवत चित लै चुराइ, सोभा बरनि न जाइ,
मनु मुनि-मन-हरन-काज मोहिनी दल साजै ॥
जननि कहति नाचौ तुम, दैहौं नवनीत मोहन ,
रुनक-झुनक चलत पाइ, नूपुर-धुनि बाजै ।
गावत गुन सूरदास, बढ्यौ जस भुव-अकास,
नाचत त्रैलोकनाथ माखन के काजै ॥
परमश्रेष्ठ नन्दभवनके आँगनमें दही मथती हुई श्रीयशोदाजी बैठी हैं । (उनके पास) खड़े
श्याम हँस रहे हैं, उनके छोटे-छोटे दाँतोंकी छटा शोभित हो रही है । देखते ही वह
चित्तको चुरा लेती है, उसकी शोभाका वर्णन नहीं किया जा सकता, ऐसा लगता है मानो
मुनियोंका मन हरण करने के लिए मोहिनियोंका दल सज्जित हुआ है । मैया कहती हैं-
मोहन ! तुम नाचो तो तुम्हें मक्खन दूँगी’ (इससे नाचने लगते हैं)चरणों के चलने से
रुनझुन नूपुर बज रहे हैं । सूरदास (अपने प्रभुका) गुणगान करते हैं – ‘प्रभो ! आपका
यह (भक्त-वात्सल्य) सुयश पृथ्वी और स्वर्गादिमें विख्यात हो गया है कि त्रिलोकीके
स्वामी (भक्तवत्सलतावश) मक्खनके लिये नाच रहे हैं ।

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